शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

हम मुस्कराना क्या जानें -


खुलकर कर हंसने वाले हैं जी  
हम मुस्कराना क्या जानें -
हम दिल लूटाने वाले हैं जी 
दिल चुराना क्या जानें -

देखी  बस्ती दिल वालों की 
बिक रहे मनमाने दाम, 
पत्थर ले, कर, चलने वाले 
फूलों से निभाना क्या जानें -

फेंक दिया दिल फूँक दिया जी, 
ये रश्म अजीही कायम है 
दिलदार दिलों पर मिटते हैं 
दिल को मिटाना क्या जानें -

चाहा जब आबाद किया 
जब चाहा बर्बाद किया ,
वो पत्थरदिल सौदागर हैं जी 
दिल को लगाना क्या जानें-

- उदय वीर सिंह 



4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (18-10-2014) को आदमी की तरह (चर्चा मंच 1770) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (18-10-2014) को आदमी की तरह (चर्चा मंच 1770) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत सुंदर

dr.mahendrag ने कहा…

दिलदार दिलों पर मिटते हैं
दिल को मिटाना क्या जानें -
सुन्दर