रविवार, 26 अक्तूबर 2014

अब आईना तलाशता है


दिल गैरोंके बीच भी  कोई अपना तलाशता है 
बीच आवारा बादलों के चाँद रस्ता तलाशता है-

हो रही दर्द की बारिस सुबह से वो खुले न खुले 
न सूखे पर अभी परिंदा फिर भींगना चाहता है -

गैरतमंद  होठों तक ,चल के जाम आया उदय  

बना हलक के दो घूंट अब आईना तलाशता है-

कितना कमजोर है बदन जज्बा ए आशिकी का 

हर दिल में जा अपना आशियाना तलाशता है -

बिकने के बाद बिछने के बाद स्वाभिमान जागा 

अब  बर्बाद  जिंदगी  का  मायिना तलाशता है -

उदय वीर सिंह 


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3 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर ।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (27-10-2014) को "देश जश्न में डूबा हुआ" (चर्चा मंच-1779) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Lekhika 'Pari M Shlok' ने कहा…

Behad lajawaab prastuti,,,,,!!