गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

अब खामोश परिंदे हैं -


थी शाखों पर शहनाई बजती 
अब खामोश परिंदे हैं -

थी पीत वसन पावन मंजूषा 
अब आगोश दरिंदे हैं -

नीत नियामक जग प्रहरी था
अब आजाद कारिंदे हैं -

लूट  रहे परदेशी आँगन 
घर बे-घर बासिन्दे हैं -

उदय वीर सिंह 


  

1 टिप्पणी:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (05.12.2014) को "ज़रा-सी रौशनी" (चर्चा अंक-1818)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।