रविवार, 25 जनवरी 2015

कलम ने कहा रोशनाई नहीं है -




कुर्ते का पैबंद ,कहे क्या कहे 
शिगाफों से कोना कोई खाली नहीं है -

अँधेरों की दहशत घरों में समाई

होली तो होली दिवाली नहीं है - 

पैरों की विबाई मुकद्दर को ढूँढे ,
कलम ने कहा रोशनाई नहीं है -

रोटी की हिफाजत करता वो कैसे
बड़ी भूख से कोई गाली नहीं है -

शहंशाहों से उत्तर की आशा भी कैसे
चलो माना कोई सवाली नहीं है -

उदय वीर सिंह

5 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (26-01-2015) को "गणतन्त्र पर्व" (चर्चा-1870) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
गणतन्त्रदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (26-01-2015) को "गणतन्त्र पर्व" (चर्चा-1870) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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गणतन्त्रदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति, गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये।

Kavita Rawat ने कहा…

मार्मिक प्रस्तुति ..
गणपत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

अर्यमन चेतस पाण्डेय ने कहा…

अन्त पसन्द आया। :)