शुक्रवार, 13 मार्च 2015

कब उत्थान संभव है ....

'मंगल प्रभात मित्रों !
बयान दर्ज है - [नशा दुर्भाग्य को अनुमोदित करता है ] 
****
बस सपनों के गांवों में ,कब सिंहासन संभव है 
सोकर वैभव की यादों में, कब उत्थान संभव है 
स्वाद रसीले जिह्वा कब बिन भोजन संभव है 
मयंक मशाल के जलने से कब विहान संभव है -

उदय वीर सिंह'
बस सपनों के गांवों में ,कब सिंहासन संभव है
सोकर वैभव की यादों में, कब उत्थान संभव है 
स्वाद रसीले जिह्वा कब बिन भोजन संभव है
मयंक मशाल के जलने से कब विहान संभव है -

उदय वीर सिंह


2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-03-2015) को "माँ पूर्णागिरि का दरबार सजने लगा है" (चर्चा अंक - 1917) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कहकशां खान ने कहा…

बहुत ही सुंदर प्रस्‍तुति।