शनिवार, 28 मार्च 2015

वंचक प्रलाप करता है

लोथ कभी जीवन का उनवान नहीं करते 
वीरों का कभी कायर सम्मान नहीं करते -
समर्थ शक्ति प्रज्ञा से अभिमान नहीं करते 
वंचक प्रलाप करता है विद्वान नहीं करते -
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करते अनुशीलन, निश्छल सरल हृदय
खल का भी किंचित अपमान नहीं करते
हैं बने शिखर प्रतिमान पी परमार्थ गरल
स्व-हितार्थ कभी ,अमृतपान नहीं करते -
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उदय वीर सिंह

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

श्री राम नवमी की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (29-03-2015) को "प्रभू पंख दे देना सुन्दर" {चर्चा - 1932} पर भी होगी!
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

बहुत खूब