रविवार, 12 अप्रैल 2015

क्या दान पर हम छोड़ते -



न कर सके प्रतिदान भी तुम
क्या दान पर हम छोड़ते -
अंकुश नहीं आभिमान पर क्या
स्वाभिमान पर हम छोड़ते -
जब आश्रय नहीं स्थूल धरा पर
क्या आसमान पर हम छोड़ते -
जब डिग रहा विस्वास अर्चन
क्या नादान पर हम छोड़ते -
आई कंधों पर अर्थी नेह की फिर
क्या भगवान पर हम छोड़ते -
उगा लिया जब विष-दंत मानव
किंचित दैत्य को क्या कोसते -

उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

लोहड़ी की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवार (13-04-2015) को "विश्व युवा लेखक प्रोत्साहन दिवस" {चर्चा - 1946} पर भी होगी!
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'