गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

रब का वास्ता देकर -

आंशू ही ढले ,ख्वाबों को लंबी उमर देकर
उदय रोया बहुत जज़्बातों को जगह देकर -

सहरा की आतिशी का मैं कैसे गिला करूँ
न किया है कोई अहसान हमने शजर देकर-

तलाशे मंजिल सफर में रहा मुसाफिर मैं 
तुम सर करो मंजिल खुश हूँ रास्ता देकर -

मांगी दुआयेँ रब से ,रहे रफ्तगी कामिल
लूटा गया बहुत मैं रब का वास्ता देकर -

उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (10-04-2015) को "अरमान एक हँसी सौ अफ़साने" {चर्चा - 1943} पर भी होगी!
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'