शनिवार, 23 मई 2015

वतन महफूज नहीं है रहने के लिए -

बचा ही  क्या है ,अब कहने के लिए 
वतन महफूज नहीं है रहने के लिए -

धरती ओ आसमां में जहर घुल रहे हैं 
शराब कामिल ,पानी नहीं पीने के लिए -

रोटी कपड़ा मकान को विंदास बोलिए 
फुटपाथ भी नहीं ख्वाब देखने के लिए -

फर्क कितना आबरू में अमीरों गरीब की 
बना खरीदने के लिए एक बेचने के लिए -

इंसाफ के सफर में कितने फ़सील हैं 
फरियादी रह गए हैं  तड़फने के लिए -

उदय वीर सिंह 

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (24-05-2015) को "माँगकर सम्मान पाने का चलन देखा यहाँ" {चर्चा - 1985} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Onkar ने कहा…

यथार्थपूर्ण ग़ज़ल