रविवार, 31 मई 2015

जिन्हें मरना नहीं आता -

मुझे टूटना नहीं आता ,व बिखरना नहीं आता 
शिकायत आँसूओं की है ,हमें रोना नहीं आता -

रखे जज़्बात फिरते हो तुम्हें कहना नहीं आता 
कहे रेशमी रुमाल रैम्प पर चलना नहीं आता -

सिवा रब की निजामत छोड़ झुकना नहीं आता 
कभी पीता नहीं हूँ मै हमे फिसलना नहीं आता -

जो सच्चा प्यार करते हैं वो नुमायिश नहीं करते 
हैं जीते वो ज़लालत में, जिन्हें मरना नहीं आता -

मेरा दिल मुझे कहता कि तुम यार अच्छे  हो 
हैं सँवरती फिजा तुमसे तुम्हें संवरना नहीं आता -

उदय वीर सिंह 

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (01-06-2015) को "तंबाखू, दिवस नहीं द्दृढ संकल्प की जरुरत है" {चर्चा अंक- 1993} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जीवन की जीवटता बनी रहे...