शुक्रवार, 8 मई 2015

पथ का मूयांकन....

पथ का मूयांकन पथिक नहीं....
मंजिल करती है
यश-अपयश के काल-खंड कलम नहीं
शुचिता लिखती है
श्री उपसर्गों की दानशीलता वैभव नहीं
प्रज्ञा बनती है 
शोक विकल अतिरंजित उर से व्यथा नहीं
कविता बहती है -
दीवा के घृत- कोशों में बाती नहीं
प्रतिभा जलती है
उत्तान श्रिग हिम खंडों से बर्फ नहीं

संस्कृति पिघलती है -

उदय वीर सिंह 

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-05-2015) को "चहकी कोयल बाग में" {चर्चा अंक - 1970} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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मन के - मनके ने कहा…

सुंदर दृष्टांत