गुरुवार, 9 जुलाई 2015

उत्सव प्रीत का चलने दो -

एक दीप बहुत काफी है 
संदेश प्रेम का पढ़ने को 
हर जाए दृष्टि  नयनो की 
आलोक विषम को रहने दो -
 मृत्यु कब देगी धैर्य  मुझे 
राग मधुर जीवन के पथ 
उपलव्ध कलश पीयूष पल के 
अब आस युगों की रहने दो -
स्पर्श वेदन का जब गीत करे 
साज बने पथ  का, पग का 
क्रंदन विमुक्त आनंद वरे उर 
उत्सव प्रीत का चलने दो -

उदय वीर सिंह 


1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज शुक्रवार (10-07-2015) को "सुबह सबेरे त्राटक योगा" (चर्चा अंक-2032) (चर्चा अंक- 2032) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक