रविवार, 30 अगस्त 2015

शहर बंजर हो जाए

संस्कारों के बीज  तो बोये गए बहुत 
संस्कृति बेअसर हो जाए तो क्या करें -

नजर खंजर हो जाए, फिजाँ  तूफान
दरिया समंदर हो जाए तो क्या करें -

मांगी दुआ थी हमने अमन बसाने की 
जब शहर बंजर हो जाए तो क्या करें -

पत्थरों के मकान में दिल पत्थर के हुए
दर सियासी मंजर हो जाए तो क्या करें -

खून का रंग सफ़ेद हो गया है रगों में
विस्वास नस्तर हो जाए तो क्या करें -

रहे अर्थियों से लेकर अर्चना तक भिज्ञ
जब प्रसून बिस्तर हो जाए तो क्या करें -

उदय वीर सिंह

2 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, सरकार भरोसे नौजवान - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

sundar kavita