बुधवार, 5 अगस्त 2015

जानवर संतों के वेश निकले ....

जिंदगी के रंग कुछ ....


जिंदगी के रंग कुछ काले 
उदय कुछ सफ़ेद निकले -
रास्ते के मुसाफिर लुटेरे 
कुछ पाक दरवेस निकले -
मिली हमें फूलों की सौगात 
जब काँटों के देश निकले -
चला था नगर अपने गाँव 
मैं परदेशी वो परदेश निकले -
दिल में जगह थी थोड़ी दे दी 
सच के लिबास फरेब निकले -
डूबने लगा सफ़ीना गैरों की कौन 
अपने भी छोड़ निकले -
जानवर तो जानवर आखिर 
कुछ जानवर संतों के वेश निकले -


उदय वीर सिंह

2 टिप्‍पणियां:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 6-8-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2059 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

यथार्थपरक सुन्दर भावाभिव्यक्ति ....