गुरुवार, 24 सितंबर 2015

वो कल्पना से तुम कर्म से हो

ऊंचा हिमालय तुम्हारी तरह है 
वो पत्थरों से तुम प्रेम से हो -

बहती है सरिता तुम्हारी तरह ही 
वो नीर से है तुम नेह से हो -

जीता सिकंदर शमशीर लेकर 
वो बैर से है तुम स्नेह से हो -

लेता अंगूठा कोई द्रोण बनकर 
वो ज्वाल सा है तुम दीप से हो -

प्रारव्ध ऊंचा तुम सा  नहीं है 
वो कल्पना से तुम कर्म से हो -

उदय वीर सिंह 

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (25-09-2015) को "अगर ईश्वर /अल्लाह /ईसा क़त्ल से खुश होता है तो...." (चर्चा अंक-2109) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

sunita agarwal ने कहा…

वाह्ह बहुत ही सुन्दर प्रेरक रचना ...
ऊंचा हिमालय तुम्हारी तरह है
वो पत्थरों से तुम प्रेम से हो -
शुभकामनाये :)