मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

दस मेरा वतन कहाँ है -

हम हुए पराए अपने आँगन
दस मेरा वतन कहाँ है -

हम विकल हुए अपनी धरती पर
दस मेरा चमन कहाँ है -

सुख दुख लेकर उडी पतंगें
दस मेरा गगन कहाँ है -

गंध बारूदी हर दिशा घुली है 
दस शीतल पवन कहाँ है -

वारे  पूत पिता तरुणी काया
दस वो सोणा वतन  कहाँ है

उदय वीर सिंह





1 टिप्पणी:

Madan Mohan Saxena ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

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