शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2015

रोटी तो चाहिए .....

जी तो लूँगा बगैर दाल सब्जी
पर रोटी तो चाहिए -

तन झाँकता है धनियाँ का
शिगाफों से बेतरह
कम से कम धोती तो चाहिए -

रेशम मलमलो मखमल के सौदागरों
गरीब के तन पर
आखिर एक लंगोटी तो चाहिए -

टांग सके आश व विस्वास को
जो पाया वादों मेँ
एक मजबूत खूंटी तो चाहिए -

खड़े हो लाश पर जीवन की बात करते हैं
आखिर उनके शतरंज के जानिब
कोई गोटी तो चाहिए -

मुझे गिला नहीं तेरे कम्युनिजम
कैपिटलिजम से हमें
अँधेरों मेँ ज्योति तो चाहिए -

उदय वीर सिंह






4 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…

रोटी जरुरी है
बहुत सुन्दर चिंतन

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (10-10-2015) को "चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज" (चर्चा अंक-2125) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

sadhana vaid ने कहा…

उत्कृष्ट सृजन ! बुनियादों ज़रूरतों के सवाल बड़ी संजीदगी से उठाये हैं ! बहुत सुन्दर !

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

बिलकुूल सही फ़र्माया !