शनिवार, 14 नवंबर 2015

नीर न जाने बहते क्यों .....

जब आँखों में नेह नहीं
नीर न जाने बहते क्यों ?

नेह नयन में आया जब
नीर न जाने बहते क्यों ?

सूनी आँखों के मरुधर...
प्रेम के बदल ढूंढ रहे
जलते पांव वेदन बढती है
नीर न जाने बहते क्यों ?

रूठा मीत परदेस बसा
न मना सके कर जोड़ उसे
ह्रदय मुकुर मन टूट गया
नीर न जाने बहते क्यों ?

उदय वीर सिंह

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (15-11-2015) को "बच्चे सभ्यता के शिक्षक होते हैं" (चर्चा अंक-2161)    पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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बालदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर