शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

गुलाम बहुत हैं -

असहिष्णुता की बात पर परेशान बहुत हैं
खो गया इंसान कहीं अब भगवान बहुत हैं -
छीनी हंसी औरों की अब विलाप कर रहे
वे तोहमत लगा रहे जो बदनाम  बहुत हैं -
मुक्त नहीं हुए आजादी के बाद भी उदय
दरबारी मानसिकता के गुलाम बहुत हैं -
पीटने वालों छाती करा दो वापस ननकाना
साहिब हिन्दू सिक्खो के वहाँ मकान बहुत हैं
खड़ा करते हैं कटघरों में मुल्जिम की तरह
लगाते हैं इल्जाम जिनपर इल्जाम बहुत हैं -
बदलता नहीं साया रंग गिरगिट चाहे बदल ले
बदल लेने वाले पाला आज महान बहुत हैं
   

उदय वीर सिंह 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (28-11-2015) को "ये धरा राम का धाम है" (चर्चा-अंक 2174) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'