शनिवार, 5 दिसंबर 2015

हम भी तेरे साथ चलते

हम भी तेरे साथ चलते
रौशनी की ओर दोस्त !
काश मेरा भी सूरज
पूरब से उगता ........।
हमसाये साथ तो हैं
पर दिशायेँ विपरीत हैं
तेरे पास थैला है ,
मेरे पास भी है ,
तुमने किताबें सँजोई हैं
हमने कचरा
तुम भी जा रहे हो.... हम भी जा रहे हैं ...
अंतर सिर्फ इतना है
तुम स्कूल जा रहे हो
हम कचरे के ढेर
की ओर ...
तुम्हारे सामने खड़ा
ज्ञानार्जन का अवसर है
मेरे सामने जीविकोपार्जन की
मजबूरीयां हैं ....तेरा बचपन तेरे साथ है 
मेरा बचपन ख्वाब 
तेरे मेरे बीच सिर्फ 
इतनी ही दूरियाँ हैं .....

- उदय वीर सिंह

2 टिप्‍पणियां:

sunita agarwal ने कहा…

dil ke kisi kone ko dravit karti rachna

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (06-12-2015) को "रही अधूरी कविता मेरी" (चर्चा अंक-2182) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'