शनिवार, 2 जनवरी 2016

उजाला छिन लेते हैं -

शाजिशों की सर्दीयां इंसाफ जम गया है 
देकर के शाल और दुशाला छिन लेते हैं 
देकर के प्रीत का पियाला छिन लेते हैं 
बेबसों की थाल से निवाला छिन लेते हैं -
शब्द छिन लेते हैं,  संवाद छिन लेते हैं 
कलम छिन लेते पाठशाला छिन लेते हैं -
वंचकों प्रलापियों की देख आत्ममुग्धता 
नानक कबीर तुलसी निराला छिन लेते हैं -
रोता है बचपन कहीं, कूड़े के ढेर पर 
देकर अंधेरों को  उजाला छिन लेते हैं -

उदय वीर सिंह 

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (03-01-2016) को "बेईमानों के नाम नया साल" (चर्चा अंक-2210) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ARUN SATHI ने कहा…

बेहतरीन

ARUN SATHI ने कहा…

साधू साधू

PBCHATURVEDI प्रसन्नवदन चतुर्वेदी ने कहा…

बेहतरीन.... आप को नववर्ष की शुभकामनाएं....