सोमवार, 21 मार्च 2016

छाज पुरानी बदलो जी ...

टपक रहा टूटा छप्पर छाज पुरानी बदलो जी 
 फटे लगे पैबंद पुराने, टाट पुरानी बदलो जी -
घुन लगे चारों पायों में चारों पाटी चटक  गई  
 बंद बंद से रस्सी टूटी खाट पुरानी बदलो जी -
कीचड़ -कीचड़ दुर्गंध सड़ांध पानी ठहर गया है 
निर्मित कर नव स्रोत नदीया का पानी बदलो जी -
परिदृश्य नवल तथ्य नए नव सृजन नव कथ्य 
हो नवयुग का निर्माण अभिशप्त कहानी बदलो जी -


उदय वीर सिंह 

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (22-03-2016) को "शिकवे-गिले मिटायें होली में" (चर्चा अंक - 2289) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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रंगों के महापर्व होली की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Vaanbhatt ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति...