रविवार, 20 मार्च 2016

जंगल है वाद है फिरके हैं ---

विदेशियों ने लूटा इस देश को तो 
आप क्यों नहीं आप में क्या कमी है-
विषमताओं का जंगल है वाद फिरके हैं
विवादों के लिए उत्तम उर्वरा जमीं है-
देश भक्ति के चोले में पलता है द्रोह
बिकता ईमान और सस्ता आदमीं है -
आचार संहिताओं की फेहरिस्त लंबी है
इन्हें मानों मानो ये मर्जी अपनी है
यहाँ खड़े चर्च गुरुद्वारे मंदिर मस्जिद
फिर भी प्यार की कितनी कम रौशनी है -
कर्ज के बोझ से मर रहा किसान मजदूर 
कर्ज अमीर की कितनी अच्छी आमदनी है-


उदय वीर सिह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (20-03-2016) को "लौट आओ नन्ही गौरेया" (चर्चा अंक - 2288) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'