रविवार, 3 अप्रैल 2016

प्रीत का पंछी ...( दोहों के द्वार )

खून प्यासा खून का, एक ही रंगत होय
बने नगीना नेह का सज्जन संगति होय -
जीवन में बहु शाम है हर भोर चंगेरी होय
विस्वास भरे संकल्प लो दोनों अवसर होय -
टूटा नेह दरख्त से पर्ण उड़ उड़ ढूंढे ठौर
टूटी आश भरोश की अंधड़ के बल ज़ोर -
उपवन हर्षित माण से बुलबुल बैठे साख
उलूक विराजे ड़ाल जब हुई प्रतिष्ठा राख़ -
प्रीत का पंछी रोता है दुख और सुख निरवैर
छूटा हाथ विछोह में या प्रीतम के घर पैर


उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (04-04-2016) को "कंगाल होता जनतंत्र" (चर्चा अंक-2302) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'