मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

हम किस दौर के समंदर हैं -

गजल इश्क में डूबी मिलती है
बनती गई है कविता दरबारी
अभिव्यक्ति बंधक मिलती है
निजता भी कितनी सरकारी है
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हम किस दौर के समंदर हैं उदय
दरिया गंदी है बादल तेजाबी है
हवाओं में है रसायन घुला हुआ
समाज में बगदादी है कहीं नाजी है -
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जुमलों के दौर में यथार्थ सिसकता है
जीवन के मसले अभिशप्त दग्ध
बेबस हम आज प्रतीक्षित वहीं खड़े हैं
आँचल में आई तो कोरी बयानबाजी है-
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उदय वीर सिंह 


1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (06-04-2016) को "गुज़र रही है ज़िन्दगी" (चर्चा अंक-2304) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'