रविवार, 8 मई 2016

माँ कर्मा [ कहानी ] पूरी दुनियाँ के माओं को समर्पित

   माँ कर्मा [कहानी ] पूरी दुनियाँ की माओं को समर्पित 
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     मदारी जैसे कहता चंचल भालू वैसे स्वांग करता ,तनिक भूल हुई की, नुकीली छड़ी शरीर में बेध देता । चंचल बड़ा समझदार बच्चा था उम्र कोई दो साल । चंचल कोशिश करता की कोई उससे गलती न हो जिससे मदारी नाराज हो । उसे मालूम है की गलतियों की सजा क्या होती है ।कई दिन तक भूखे प्यासे भी रहना पड़ा है । नाक में मजबूत रस्सी की नकेल गले में कसी चमड़े की बेल्ट, कतर दिये गए नाखून, चमड़े की छोटी बेल्ट से बंधा हुआ मुंह उतना ही खुलता कि मुंह की राल निगल सके । खाना भी उतना ही कि जी सके, और मदारी के लिए पैसे कमा सके । उसे अपना जंगल और माँ बहुत याद आते । दिन भर मदारी के साथ शहर कस्बा गाँव अपना करतब दिखाता लोग खुश होते ,मदारी को पैसे मिलते । यही उसकी दिनचर्या हो गयी थी ।
     चंचल को हरित वन से घात लगा कर वन कर्मियों की मिली भगत से मदारी ने पकड़ लाया था । बस्ती में उसे प्रशिक्षित कर अपना रोजगार चला रहा था । चंचल अपनी माँ कर्मा के पास जाना चाहता था ,परंतु वह असहाय था रस्सियों में रात दिन जकड़ा हुआ । खाने के समय कुछ समय के लिए मदारी उसे खोलता । फिर लगाम कस उसे पेड़ से बांध देता । चंचल अपनी बगावत का परिणाम भुगत चुका था ।कितनी निर्दयता से मदारी ने मारा था , बाल समेत चमड़ी भी उधड़ गयी थी ,घावों में कीड़े लग गए थे ,लाचार इतना की घावों को वह चाट भी न सकता था । वह अपनी नियति पर अपने को छोड़ दिया था । फुरसत के क्षणों में अपना अतीत याद करता और अतीत में माँ कर्मा के सिवा उसके करीब और कोई न था । परिजन भाई बहन कुछ -कुछ याद आते हैं, पर माँ का प्यार लगाव बह नहीं भूल पाता है । यादें बहुत व्यग्र करती है । यहाँ उसकी उदासी पीड़ा पर मरहम लगाने वाला कोई न था । उसके आँसू पोंछने वाला कोई न था । जब मदारी की पत्नी अपने बच्चे को दुलारती दूध पिलाती तो चंचल को माँ कर्मा बहुत याद आती, आंखे छलक उठतीं । वह कैद में कितना बेबस और दुखी था ।
     पिछले महीने माँ कर्मा स्वयं को छिपते -छिपाते मदारी के आवास के पास अपने बेटे चंचल से मिलने रात को आ गई थी । बेटे की दारुण स्थिति को देख मानो पागल सी हो गयी थी ,बिना देर किए बंधनों से मुक्त कर दिया । साथ चने का इशारा किया और दोनों चल पड़े पर मदारी का कुत्ता आहट पर जग गया और भौंकने लगा था ,मदारी की नींद टूट गई । हड़बड़ा कर उठा देखा माँ कर्मा और चंचल भागे जा रहे हैं ।
मदारी और उसके परिजन शोर मचाते पकड़ने को पीछे पीछे दौड़ पड़े । चंचल के गले में लटक रही रस्सी, माँ के साथ भागने में बाधा बन रही थी ,जो हड़बड़ी में नहीं कट पाई थी । माँ मुड़-मुड़ कर देखती ,रुकती ,फिर आगे भागती पर हथियारों से लैस मदारी व परिजन लगातार पीछा कर रहे थे, वे पकड़ने या मार देने पर आमादा थे । अंततः चंचल पुनः मदारी की गिरफ्त में था । पकड़े जाने के बाद चंचल को असीम यातना सहनी पड़ी । जिसकी कल्पना भी वह करने से डरता है ।
आज सुबह के पाँच बज गए थे, सूरज निकल आया था ।
नाश्ता कर लो लगा दिया है रोटी ठंढी हो जाएगी । मदारी की पत्नी ने आवाज दी ।
अभी आया जी । मदारी रस्सियों एवं अन्य सामानों को सम्हालता हुआ बोला ।
आज मेला है पास के कस्बे में वहीं आज चंचल का खेल होगा मदारी रोटी खाते हुये बोला
तो पैसे भी आज चंगे ही मिलेंगे जी । मदारी की पत्नी ने चहकते हुये कहा ।
मिलने चाहिए ,कई बार खेल दिखाने को मिलेगा । मेले में भीड़ भी ज्यादा होगी । मदारी ने कहा
मदारी अपना नाश्ता कर अपने बच्चे को पुचकार पत्नी से मीठी बात करते हुये दिनचर्या में व्यस्त था ।
चंचल आज सुबह से व्यग्र था उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था ।आज मदारी रोज की तरह दो सूखी रोटी नहीं बल्कि चार रोटियाँ व दो लड्डू और ,चार केले उसके सामने फेंक , मिट्टी के बर्तन में पड़ा बासी पानी को उसकी तरफ सरका दिया था ।
चंचल जल्दी से खा ले आज मेले चलना है ,आज बहुत करतब दिखने हैं ,शरारत नहीं होनी चाहिए । हाँ ! मदारी थोड़ी नरमी से निर्देश देते हुये बोला ।
अब खेल-तमाशे के वह साजो समान बांध ,जाने को तैयार हो रहा था ।
तभी शोर होने लगा कुत्ते भौंकने लगे मारो ,भागो ! भालू आया .... भालू आया , बस्ती के लोगों में अफरा तफरी थी अभी कुछ समझ पाते की ,चंचल की माँ कर्मा ने मदारी के घर हमला कर दिया था । वह बस्ती में अपने चंचल को मुक्त कराने आ गयी थी । उसे कोई खौफ नहीं था । उसे मालूम था की मौत पक्की है पर संकल्पित थी अपने बच्चे को मुक्त कराने के निमित्त ।
मदारी को घायाल कर दिया उसकी पत्नी को खदेड़ दिया , मदारी के छोटे बच्चे की तरफ देखा उसे कुछ नहीं कहा । बस्ती के लोग अब हथियार ले कर्मा को मदारी के घर के पास घेर लिए थे । बहादुर कर्मा वार झेलती हुई ,चंचल को बंधन मुक्त कर चुकी थी । इधर उस पर मदांध भीड़ लाठी बल्लम भालों से वार पर वार किए जा रही थी । चंचल खूंखार हो था अपनी माँ के हमलावरों पर दहाड़ने लगा बचाव में माँ के ऊपर आ गया, तभी एक जाल माँ बेटों पर गिरी और दोनों निढाल हो जाल में फंस पस्त हो गए थे ।बस्ती में भालू की दस्तक सुन वनकर्मी जाल लेकर पकड़ने आ चुके थे ।
जाल के भीतर चंचल अपनी माँ की ओर देख रहा था ,उसको लगे अनेकों घावों को चाट रहा था,जख्मों से खून लगातार बह रहा था । साँसे बहुत तेज थीं..आंखे खोल कभी बंद कर चंचल की ओर देख लेती ..अचानक उसके मुंह से हुफ !! हुफ़्फ़ !! की आवाज निकली । चंचल अपनी माँ कर्मा के मुंह को देखा । माँ अब उससे छोड़ दूर जा चुकी थी, बहुत दूर ।
चंचल अब मुक्त हो जाएगा । जंगल में इलाज के बाद छोड़ दिया जाएगा । किसी ने कहा आज मातृ दिवस है ।एक माँ ने अपने बच्चे को मरकर भी ,बंधन -मुक्त करा दिया ।
उदय वीर सिंह



2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (10-05-2016) को "किसान देश का वास्तविक मालिक है" (चर्चा अंक-2338) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

sunita agarwal ने कहा…

oh behad marmik