शनिवार, 11 जून 2016

बँटवारे मे पेन्सन --[ लघु कथा ]

बालमुकुंद पाठक एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापक थे , स्कूल कुछ मील की दूरी पर था प्रतिदिन का आना जाना था , रास्ते में ही एक सरकारी बैंक भी था जहां भाऊ मजरे के लोग अपना खाता खोले हुये थे, जहा से उनको सरकारी पेन्सन व अन्य फसलों का नकद भुगतान खातों के माध्यम से प्राप्त होता था।आस पास के मजरे के लोग भी छोटी बड़ी वचत,व विकास कार्य हेतु आर्थिक मदद [ऋण ] प्राप्त करते । 
    पड़ोसन बेवा बैजन्ती देवी को उसी बैंक शाखा से वृद्धा- पेन्सन तीन सौ रुपया प्रति माह प्राप्त होती थी ।जो छह माह में एक बार बैंक खाते में आती थी । आज सुबह बैजन्ती देवी ने बालमुकुंद जी को अपनी साइकिल से बैंक तक छोड़ देने का निवेदन किया था , कारण बुढ़ापा था ,चल फिर पाने में तकलीफ थी, और कोई मददगार नहीं दिखा ।
   चाची ! हम छोड़ तो देंगे पर बैंक से वापस कैसे आएंगी ! जेठ का दोपहर भयंकर गर्मी है । शरीर भी कमजोर है । तबीयत भी ठीक नहीं है ।बाल मुकुन्द जी ने पूछा -
बाबू का करें , बड़का बेटवा रामप्रकाश की बेटी बीमार है, दुआ- दवाई का कोनो इंतजाम नाहीं है , रामदयाल प्रधान बता रहे थे की बुढ़ापा पेन्सन आया है । वो मंगाने का मांग रहे थे दो सौ रुपैया, पास में नाहीं था सौ दिये और देना है ।
ई महिना में छोटे बेटे सतप्रकाश के साथ रहना है । दोनों में झगड़ा तकरार अनबन चल रही है हमारी बात का कौनों असर नाहीं है , मालिक के चले जाने के बाद हम केतना दुख उठा दोनहुन के पढ़ाये, बड़ा किए, अब ई समय में ठोकर लिखा है का करें किसको दोस दें ,केवन जतन करे ...। बैजंती देवी झरते हुए आंसुओं को आँचल से पोंछ रहीं थी ।
चाची न रोईं हम ले चलेंगे और घर वापस भी छोड़ के स्कूल जाएंगे दिल मत दुखी करिए । बालमुकुंद जी खड़े होकर बोले ।
बाबू हम हम धीरे धीरे उठत बैठत कइसो आ जाएंगे । आप के काम के हरजा होई ।
चाची हम संभाल लेगे आप न चिंता करी ।
बाल मुकुन्द जी बैजंती जी को बैंक ले जाकर अठारह सौ रुपये की निकासी करा कर घर वापस छोड़ स्कूल चले गए ।
दोपहर ढले बाद जब घर लौटे । तो पड़ोस में कोहराम मचा था । सूना सूना व अजीब विषाद भरा वातावरण था ।एकके दुक्के लोग त्धर उधर आ जा रहे थे ।
घर में पुछने पर पत्नी राधा देवी ने बताया -
बैजंती देवी के दोनों बेटों रामप्रकाश और सत्यप्रकाश में पेन्सन के पैसे को लेकर विवाद ,फिर हाथापाई और मारपीट हो गई । दोनों को पुलिस पकड़ कर थाने ले गई है । दोनों की पत्नियाँ पास के प्राथमिक अस्पताल में हैं भर्ती हैं । बच्चे घर अकेले हैं रो रहें है ।
आखिर हुआ क्या था ? बाल मुकुन्द जानना चाह रहे थे ,
आपस में बँटवारे के हिसाब से इस महीने में चाची जी को सत्यप्रकाश के पास रहना था सो पेन्सन सत्यप्रकाश मांग रहा था । चाची जी ने रामप्रकाश को दे दिया क्यों की रामप्रकाश की बेटी को मियादी बुखार हो गया है शख्त जरूरत थी । और इस बात पर झगड़ा शुरू हो गया । चाची बीच बचाव करने लगीं ,दोनों ने धक्का दे दिया गिर पड़ीं । फिर वापस आ बैठ रोती रहीं , गहरा सदमा लगा उनको फिर किसी से कोई बात नहीं किया सिर्फ रोती रहीं । बहुए भी कम नहीं, उनहों ने भी वाकयुद्ध छेड़ दिया फिर लड़ पड़ीं । चाची को कोई पुछने वाला नहीं था ।
बाल मुकुन्द जी एक गिलास ठंढा पानी पी आनन फानन में पड़ोस में पहुंचे ।
मंजर देख दंग रह गए । दोनों के पाँच बच्चे लेटी हुई दादी बैजंती देवी को घेर कर उदास बैठे हुये थे । बाल मुकुन्द के पुछने पर बोले-
देर से दादी जी सो रही है कुछ बोल नहीं रही ।
हमारे मामा जी आए हैं वो अम्मा को लाने गए हैं । विकास के मामा जी नहीं आए हैं । रामप्रकाश की बीमार बेटी ने बताया ।
रोते हुये अबोध बच्चों के स्याह चेहरों पर आँसू सुख गए थे । निराश थे अपनों के आने की प्रतीक्षा में थे ।
बाल मुकुन्द ने चाची ! चाची ! कह बैजंती देवी को झँझोड़ा फिर ऊंची आवाज दी पर कोई प्रतिक्रिया न हुई । चाची बैजंती देवी बच्चों के घेरे के बावजूद वो घेरा तोड़ जा चुकी थी । पेन्सन व परिवार के विवाद से बहुत दूर ।
उदय वीर सिंह




1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (13-06-2016) को "वक्त आगे निकल गया" (चर्चा अंक-2372) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'