बुधवार, 6 जुलाई 2016

आशाहीनता ही मृत्यु है -

सहरा में फिर भी, शजर
कम नहीं हैं -
इनायत भरी कुछ, नजर
कम नहीं हैं -
जो रुसवा हुये कुछ,मुंतजिर
कम नहीं हैं -
गर मंजिल है दिल में, डगर
कम नहीं हैं-
विच तूफनों की बस्ती सफर
कम नहीं हैं
नेक रस्तों के जानिब हमसफर
कम नहीं हैं -
उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (08-07-2016) को "ईद अकेले मना लो अभी दुनिया रो रही है" (चर्चा अंक-2397) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'