मंगलवार, 13 सितंबर 2016

तुम उगाओ अन्न हमें बेचने दो

तुम उगाओ अन्न हमें बेचने दो
तुम चलाओ हल  हमें सोचने दो
तुम्हे वाणिज्य वित्त व्यापार नहीं आता
ये अर्थ की बाते हैं हमें करने दो -
तुम ग्रामीण अनपढ़ असभ्य हो
प्रज्ञा शील अनुशासन का भान नहीं है
तेरी दो रुपये की मूली पंद्रह में बेचते हैं
हम नसीब वाले तुम पर प्रभु का ध्यान नहीं है
तुम मशीन हो हम नियामक
तुम अपने काम पर ध्यान रहने दो -
दाना उगा कर भी तुम्हें खाना कहाँ आता
लस्सी दूध साग के सिवा पकाना क्या आता
तुम उगाते रहो फल खेतों में
हमे शराब बनाते रहने दो -
फर्क है तुम्हारी और हमारी चमड़ी में
तुम्हारी नियति है धूप बरसात में रहना
हमें एसी में रहते हैं रहने दो -
मत बदलो परंपरा को
मत सोच बहुत न्याय अधिकार सम्मान
भेद भाव पारदर्शिता अभावों को
तु किसान पैदा हुआ है मुकद्दर है
अपने को किसान रहने दो -
जब प्रेम में होते हो
आत्म हत्या कर लेते हो अच्छा है
विपत्तियाँ आती है ईश्वर देता है अच्छा है
कर्ज लेकर शादी घर पढ़ाई दवाई क्यों खरीदा
जीवन नश्वर है बिना कर्ज भी चल सकता है
चलते रहने दो -
किसान का बेटा किसान ही होना चाहिए
ये परंपरा चली आ रही चलने दो-

 उदय वीर सिंह


3 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 14 सितम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (14-09-2016) को "हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ" (चर्चा अंक-2465) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

और क्या- हमारा काम होना चाहिये ,भाड़ में जाओ तुम !