गुरुवार, 8 सितंबर 2016

अमावस की रात में सितारे न ढूंढिए

जले घर की राख़ में अंगारे  न ढूढ़िए 
अमावस की रात में सितारे न ढूढ़िए -
प्रतीक्षा ही अच्छी है घावों को भरने की 
कभी उजड़े दयारों में, बहारें न ढूंढिए -
मंजिल के पाँव कब रुकते हैं राह में 
तैरने की कोशिश हो सिकारे  न ढूंढिए -
वास्ता है दरिया से लहरों से आशिक़ी 
छोड़ करके हाथ अब किनारे न ढूंढिए -
तम्बू मुकद्दर जब यही आशियाना है 
 लगाने को खूँटियाँ दीवारें न ढूंढिए -

उदय वीर सिंह 



2 टिप्‍पणियां:

Deepak Saini ने कहा…

बहुत खुब

poet kavi ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (10-09-2016) को "शाब्दिक हिंसा मत करो " (चर्चा अंक-2461) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'