गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

मत पुछो वीर कि बुरा लगता है


मत पुछो वीर कि बुरा लगता है
सावन के अंधे को सदा हरा लगता है

चाँद की बिसात क्या सूरज उगाये मैंने
धरती ही नहीं आसमान भी डरा लगता है

जिद है या खुद को बहलाने का प्रयास 
झूठ भी कितना खरा लगता है -

सत्ता सियासत का बाजार बे मुरौअत
बेटा भी वलि का बकरा लगता है -

खामोश हो गए ओढ़े कफन ए तिरंगा
रेशमी राजनीति को मसखरा लगता है -


उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (21-10-2016) के चर्चा मंच "करवा चौथ की फि‍र राम-राम" {चर्चा अंक- 2502} पर भी होगी!
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'