मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

वीर मरुस्थल को सुंदर उद्यान बनाने की सोचो

वीर मरुस्थल को सुंदर उद्यान बनाने की सोचो
रुई से पुतले आग नहीं परिधान बनाने की सोचो
हर तन में रहता है एक नीरव संवेदनशील हृदय
शिक्षालय में भगवान नहीं इंसान बनाने की सोचो -
बरसेंगे आतंक के बादल नीर नहीं ज्वाला होगी
नाद विध्वंश का ऊर्जित होगा गेह नहीं कारा होगी
अंतस में आशा और विश्वास सृजित होता जाए
निज राष्ट्र संस्कृतियों को महान बनाने की सोचो -
उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (07-12-2016) को "दुनियादारी जाम हो गई" (चर्चा अंक-2549) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'