शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

खाई गरीब घर रोटी गरीब जैसा हो गए


खाई गरीब घर रोटी गरीब जैसा हो गए
छिड़क लिया गंगा जल पहले जैसा हो गए -
देख गरीब को आँखों मेंआँसू बहे टूटकर
शर्मिंदा हुआ घड़ियाल जा मरा कही डूबकर
गरीब की बेटी के सिर रखाआशीष भरा हाथ 
होकर कलंकिनी मर गई ट्रेन के नीचे कूदकर -
गिरगिटों की तरह भेष बदलने का हुनर है
बहुरूपिये भी न जाते उनके डगर भूलकर -
अवतारी हैं देवों देवदूतों के हर मर्ज की दावा हैं
चमत्कार है सूखी नदी पार कर लेते हैं तैरकर -
नापसंद है हर चेहरा उनके चेहरे को छोड़कर
फिर भीओढ़ मुखौटा बदले भेष उनके जैसा हो गए

उदय वीर सिंह



1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (19-08-2017) को "चीनी सामान का बहिष्कार" (चर्चा अंक 2701) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'