शनिवार, 26 अगस्त 2017

सिर्फ गर्दन हमारी है -

मुशिफ भी तुम्हारा है वजीर भी तुम्हारा है
शमशीर भी तुम्हारी है सिर्फ गर्दन हमारी है -
खेल भी तुम्हारा है खिलाड़ी भी तुम्हारे हैं
पत्ते भी तुम्हारे हैं सिर्फ हार ही हमारी है -
मुल्क भी हमारा है ये मिट्टी भी हमारी है
अमन के सिपाही हैं ये किस्मत तुम्हारी है

उदय वीर सिंह       

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1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (28-08-2017) को "कैसा सिलसिला है" (चर्चा अंक 2710) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'