मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

दधिच हमारे देश -

बोने वालों को प्रणाम लोकतन्त्र का बीज हमारे देश
हुए उजागर कितने सारे नीच हमारे देश ॥
रास न आता संविधान मानवता की बात
जाते बिसराए मानबिन्दु दधिच हमारे देश -
दमन द्वेष अन्याय की प्राचीरों को गिरना था
समता मूल्य प्रेम की सरिता को अविरल बहना था
ठूंठ दरख्तों पर बैठे कुछ गिद्ध निगाहें मैली ले
त्याग समर्पण तपोभूमि पर फैलाते हैं कीच-
देश- प्रेम का आडंबर है ,करते सौदा भारत का
हानि लाभ के मतावलंबी मोल लगाते तन आरत का
देश मुनाफ़ा धर्म मुनाफा भूमि मुनाफा मानस में
छोड़ गए मझधार में नैया हैं बीच हमारे देश -
उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (14-02-2017) को "महामृत्युंजय मंत्र की व्‍याख्‍या" (चर्चा अंक-2880) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'