रविवार, 1 जुलाई 2018

खोना जानता है ...


साधनों की सेज सोना चाहता है
वेदना के नाम रोना जानता है
धुप की चादर मिली क्या
कुंद मानस हो गया
क्षितिज पर बृक्ष का संहार
नभ में छाँव बोना चाहता है -
तमस में दीप का उपक्रम नहीं
खोजता है पथ सुघर
परायी कंध पर रख बोझ अपना
बोझ ढोना चाहता है -
बेचकर गंतव्य पथ
पग महावर साज ली
क्रंदन कृपा की ओट ले
गंतव्य पाना चाहता है -
उदय वीर सिंह



1 टिप्पणी:

Dhruv Singh ने कहा…

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' ०९ जुलाई २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।



आवश्यक सूचना : रचनाएं लिंक करने का उद्देश्य रचनाकार की मौलिकता का हनन करना कदापि नहीं हैं बल्कि उसके ब्लॉग तक साहित्य प्रेमियों को निर्बाध पहुँचाना है ताकि उक्त लेखक और उसकी रचनाधर्मिता से पाठक स्वयं परिचित हो सके, यही हमारा प्रयास है। यह कोई व्यवसायिक कार्य नहीं है बल्कि साहित्य के प्रति मेरा समर्पण है। सादर 'एकलव्य'



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