रविवार, 17 नवंबर 2019

मायिन


मायिन [ लघु कथा ]
जितने दिन गर्भ में रहा उतने ही दिन लगभग दुनियां में आये हुए थे. उसके मासूम बेटे को । माँ चानो गर्दिशी व गुर्बती के कारन कोई नया पटोला अभी नहीं दे पाई थी अपने मासूम को । कुछ पड़ोसियों परिचितों कुछ गरीब मायके वालों से मिले थे,काम चल रहा था , प्रतीक्षा थी दीपवली की कि उसका परदेशी पति नारद जरुर कोई मदद करेगा ,करीब दस महीने से कोई मदद नहीं भेजा है । पर चेहरे पर मुस्कराहट भी कम नहीं बहुत दुलार देती थी अपने मासूम बेटे को । नाम भी रखा उसका नंगू । इधर बिच में नंगू काफी बीमार भी हो गया था जब बाढ़ का प्रकोप था ,डेंगू हो गया था ,बड़ी मुश्किलों से उसकी जान बच पाई, पर घर के गहने व बेचने लायक सामान सब गिरवी या बेचने पड़े ।
कुलदीप सिंह गाँव के सरपंच के पास चानो गयी थी बोली -
बाबूजी ! मेरा आधार कार्ड में जन्म तिथि गलत हो गयी है उम्र 85 साल बता रहा है , सुधार के लिए कई कागज ,बयान बनवा कर दिए हैं , मुझे मेरी जनम तिथि नहीं मालूम ...पता नहीं कब सुधार होकर आएगा ..
मेरा राशन कार्ड नहीं बन पा रहा है .....मेरे घर में अन्न का एक दाना नहीं है ,मैं कई दिन से भूखी हूँ मेरा लल्ला नंगू बीमार व भूख से रोता है ,बाबूजी मेरा राशन -कार्ड बनवा दीजिये ,आप कोटेदार जी को बोल देंगे तो वो बना देंगे ,वो आपके रिश्तेदार भी हैं ।
तू गटुआ की बीबी है ?
हाँ बाबूजी । चानो बोली
जा करन सिंह को बता देना ,कि बाबूजी भेजे हैं .राशन कार्ड बनाने को
वो बना देगा . जा सरपंच ने अस्वासन दे कर भेजा
सरपंच के कहने पर भी चानो का राशन कार्ड ,,आधार कार्ड के आभाव में नहीं बना .. अभी इंतज़ार में है
..... नंगू को बुखार है लगातार रो रहा है ,पड़ोसन ने थोडा सत्तू चानो को दे गयी थी ,जिसे खाकर रात अपनी भूख को शांत कर पाई थी , कोई सहारा आस नहीं दिख रही थी मद्धिम चिराग भी टिमटिमा कर बुझ गया था
कितना किससे अपना दुखड़ा रोये ,कौन जातन करे ?,शरीर कमजोर ,दुधमुंहाँ बच्चा , स्तन से दूध निकलता नहीं ,परन्तु नंगू उसे हमेशा मुंह में डाले रखना चाहता है ।शायद उसे दूध का अहसास होता है,मजबूर चानो कभी पुचकारती दुलारती और दूध पिलाने से बचती और नंगू है की पीने की जिद करता है ..आखिर बेबस माँ उसे निराश नहीं करती ...थोड़े देर किए लिए नंगू चुप हो जाता कुछ पल शांति फिर भूख का मारा रोना शुरू करता .....
भूख लाचारी के दंश से मर्माहत चानू चारपाई के पास बैठ गयी । सुबह सूरज निकलने लगा , रात को रत्ती भर भी चानो सो न सकी ,आँखों को नींद नहीं मयस्सर हुयी इस जीवन का क्या करे, कैसे संभाले अपने आपको ..। रिश्ते नाते कब तक ढोयेंगे बोझ की तरह ..पति संज्ञा सुन्य किसी और ठांव मस्त ,बस्ती के लोग बाग़ अपने कार्यों में मशगुल हुए ,रोटी रोजी के जुगाड़ में कौन किसकी परवाह करे ....चलते गए ।
माँ बेटा दोनों भूखे ,दोनों के आँखों में अश्रू प्रवाह निरंतर बहते रहे . चानो अपने भाग्य को रोती .. दोनों बाँहों के बीच पड़ा नंगू याचना और आश भरी निगाहों से माँ की ओर .लाचार माँ भूखे बीमार बेटे की ओर देख रहे थे .
माँ ने आँचल से ढक. भूखे नंगू को स्तनपान कराने लगी .. सूखा स्तन नंगू चूसता रहा ,भूखी शरीर से दूध नदारद था ..
अचानक कुछ दर्द सा हुआ ,चानों ने देखा तो नंगू का मुंह खून में सना हुआ था ।
घबरायी कहीं बेटा खून की उलटी तो नहीं कर रहा ... ध्यान से देखा तो उसके स्तन से खून रिस रहा था नंगू का मुंह खून से भरा ..
दुर्दिन व् अवसाद का इससे बड़ा बोझ और क्या हो सकता था ,एक माँ को अपने बच्चे को पालने के लिए उसके पास ......
चानो ने बड़ा फैसला ले लिया जो कदाचित कभी कभी लिए जाते हैं , ये जिंदगी कितना और सितम देगी ..पता नहीं ... ?
उसने जिस हाथ से बेअंत लाड करती थी उसी हाथों से अपने लाल का गला घोंट दिया और सामने कुंए में छलांग लगा कर अपनी बेबस लाचार जिंदगी के अध्याय को बंद कर दिया ,शायद इसे सुगम बनाने का और कोई पथ शेष न था ।
उदय वीर सिंह






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