बुधवार, 14 अप्रैल 2021

दोपहर में शाम हो जाना



नियति नहीं साज़िश है दोपहर में शाम हो जाना।

आग को सह देना है,हवा का बेलगाम हो जाना।

माज़ी खड़ा है लिए तख्तियों पर अपनी आवाज,

जहन्नम है,जुबान वालों का बेजुबान हो जाना ।

आग चूल्हों में जले तो ईद बैसाखी दिवाली है,

लगी पेट तो लाज़िमी है दौर का हैवान हो जाना

नफ़रत की जमीन पर ज़हर की तिजारत है ,

इंसानियत से दूरी का जमीं आसमान हो जाना।

उदय वीर सिंह।

6 टिप्‍पणियां:

रेणु ने कहा…

नियति नहीं साज़िश है दोपहर में शाम हो जाना।
आग को सह देना है,हवा का बेलगाम हो जाना।!!!
वाह👌👌👌 उदय जी, बहुत खूब लिखा आपने। हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🙏💐💐

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

फ़रत की जमीन पर ज़हर की तिजारत है ,

इंसानियत से दूरी का जमीं आसमान हो जाना।

सटीक बात कहती सुन्दर ग़ज़ल .

दिलबागसिंह विर्क ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 14-04-2021 को चर्चा – 4037 में दिया गया है।
आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।
धन्यवाद सहित
दिलबागसिंह विर्क

शिवम् कुमार पाण्डेय ने कहा…

वाह...!

रेणु ने कहा…

टिप्पणी प्रकाशित भी किया करें, आपसे विनम्र आग्रह है🙏🙏

रेणु ने कहा…

उदय जी एक भी टिप्पणी प्रकाशित की आपने। अच्छा है आप टिप्पणी बॉक्स हटा दें ताकि कोई टिप्पणी ना कर सके। बहुत दुखद लगता है modration का होना 😔😔😔😔