रविवार, 24 अक्तूबर 2021

भरोषा टूटता चला गया,....









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भरोषा था अपनों पर,

टूटता चला गया।

आयी गर्दिशी तो हाथ,

छूटता चला गया।

मुखबिरी अपनों ने क़ी,

गैर लूटता चला गया।

कच्चा घड़ा था वो नेह,

बूंद पड़ी गलता चला गया।

न बहा गर्दिशी के दौर,

आज बहता चला गया।

पीर में कोई बुलबुला था वीर,

फूटता चला गया।

उदय वीर सिंह।

4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह

भरोसा

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 25 अक्टूबर 2021 को साझा की गयी है....
पाँच लिंकों का आनन्द पर
आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Manisha Goswami ने कहा…

ऐसा लगता है जैसे ये रचना हमारे ऊपर ही लिखी गई हो आपने हमारे मन की बात चुरा ली!
हकिकत को बयां करती बहुत ही उम्दा रचना!

Sudha Devrani ने कहा…

भरोषा था अपनों पर,

टूटता चला गया।

आयी गर्दिशी तो हाथ,

छूटता चला गया।
गर्दिशी में जो हाथ छोड़ गये वो अपने थे ही नहीं
बहुत ही हृदयस्पर्शी सृजन।