बंधे हैं हाथ वरना तुम्हें हक़ न देते बर्बादी का
तमाशबीन होकर रह गया हूँ -
मजबूर हूँ की इनसान हूँ ये मेरी खता
कमजोर होकर रह गया हूँ -
जानवर और इन्सान में फर्क कितना है ,
ये सोच कर रह गया हूँ -
वैसे शमशीर के दाग बयां करते हैं डंगरों के हस्र,
देख कर रह गया हूँ -
याद रख देश प्रेम की प्यास खून भी पीती है,
ये कल्पना नहीं हकीकत कह रहा हूँ -
फट जायेंगे कान के पर्दे दहाड़ों दे नापाक
भारत जिंदाबाद कह रहा हूँ -
-उदय वीर सिंह।

मजबूर हूँ की इनसान हूँ ये मेरी खता
कमजोर होकर रह गया हूँ -
जानवर और इन्सान में फर्क कितना है ,
ये सोच कर रह गया हूँ -
वैसे शमशीर के दाग बयां करते हैं डंगरों के हस्र,
देख कर रह गया हूँ -
याद रख देश प्रेम की प्यास खून भी पीती है,
ये कल्पना नहीं हकीकत कह रहा हूँ -
फट जायेंगे कान के पर्दे दहाड़ों दे नापाक
भारत जिंदाबाद कह रहा हूँ -
-उदय वीर सिंह।