मंगलवार, 13 सितंबर 2022

फुलकारियाँ निलेंगी...






 ...........✍️

विस्वास रखो  विरमित  हुए  हाथों से,

चित्रकारियां निकलेंगी।

मौन हैं स्तब्ध नहीं इन होठों से प्रलेखों

की आरियां निकलेंगी।

अग्निपथ का शमन होनाअवश्यम्भावी है 

शांति की सवारियां निकलेंगी।

पी लेते हैं गरल समभाव की गर्वित

संभावनाओं पर,

उन्माद आघात पर प्रतिघात की 

चिंगारियां निकलेंगी।

जलकर भी उर्वरता नहीं खोई अपनी

ममतामयी जमीन,

आज वीरान राख भरी कल मर्मस्पर्शी

फुलकारियाँ निकलेंगी।

न पढ़ सका कोई सौदाई चमन की संवेदना अन्तर्वेदना,

दमन  के बाद भी गुलों की क्यारियां

निकलेंगी।

उदय वीर सिंह।

गुरुवार, 8 सितंबर 2022

इल्ज़ाम मिलता रहेगा....


 





........✍️


जब तक झूठ को मुकाम मिलता रहेगा।

सच को हमेशा इम्तिहान मिलता रहेगा।

दरबारी कलम लिखेगी जब भी लिखेगी,

हिंद को मानसिक गुलाम मिलता रहेगा।

रोज मरने की आदत पुरस्कृत होती रही,

बाद बेगुनाही के इल्ज़ाम मिलता रहेगा।

सेवा त्याग कुर्बानी की तासीर कायम रही

इंसानियत  को  सतनाम मिलता रहेगा।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 6 सितंबर 2022

शिक्षक गुरु....





 शिक्षक दिवस को समर्पित...🙏🏻

उज्वल पथ गंतव्य सुघर गुरु  

सास्वत  नेह तुम्हारा है।

वीथी समस्त मधुमय सबल 

कली किसलय  पात संवारा है

अंबर अनंत दृग बहु विशाल 

सूक्ष्म  तत्व  के  विश्लेषक,

स्पंदन संवेदन मर्म अनुभूति

गुरु आश्रय प्रेम की धारा है।

प्रज्ञा यश पौरुष कर्तव्य-प्रणेता

न्याय नीति का अनुशंसक

क्षमा दया करुणा में शीतल 

कामी वंचक को अंगारा है।

अंधड़ झंझावात काल दुर्दिन

की धार निराशा में,

प्रलय की निर्मम नदिया में

गुरु  पावन सरस किनारा है।

उदय वीर सिंह।

59।22

सोमवार, 5 सितंबर 2022

धर्म जाति के तालों में....





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सागर  डूब  रहा जा रंगमहल के प्यालों में।

नदिया डूब रही है  कीचड़ -छिछले नालों में।

एक धरती का टुकड़ा कितना पिछड़ा जाता,

वतन हमारा डूब रहा धर्म-जाति के तालों में।

इश्तिहार  उत्थान  के  टूटे बिखरे बिलट गए,

भूख यतिमी मजबूरी आयी सबकी थालों में।

पाखंडों की हवेली से उच्च हिमालय बौना है,

मनुज जला जाता उन्माद भेद की ज्वालों में।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 30 अगस्त 2022

कंचन, कंचन रहता है






 ......✍️

अर्श रहे या फर्श रहे
कंचन, कंचन रहता है।
अवसरवाद के आंगन में
परिवर्तन रहता है।
जितना टूटा जितना बिखरा
उतने अक्स दिखाता,
न बदला अपनी सीरत
दर्पन, दर्पन रहता है।
बंद मिला करती है चौखट
देखा परवाजों के ख्वाब,
स्वार्थ सिद्धि के द्वारों तक
अभिनंदन रहता है।
मर्यादा यश अभिमान वरण
कर कटार ले लेता।
आभूषण की छांव बैठ
कंगन,कंगन रहता है।
उदय वीर सिंह।
29।08।22

शनिवार, 27 अगस्त 2022

तपता सूरज ढल जाता है...






 ........✍️

तिनके तिनके जल उठते हैं

सारा जंगल जल जाता है।

नंगे पदचांपों की आहट से 

प्रस्तर श्रृंग भी हिल जाता है।

न मिटा सका है ताप अखंड

जन जीवनअविरल जाग्रत है,

एक बिरवे की छांव ही काफी

तपता सूरज भी ढल जाता है।

यदि धन-धार हृदय में संचित है

सम्मान सहित मर जाने की,

क्रूर नियति के गल,गाल बसे

अवरोध द्वार भी खुल जाता है।

उदय वीर सिंह।

बुधवार, 24 अगस्त 2022

रब छोड़ जाऊंगा...





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मैं अपनी गीतों का सबब छोड़ जाऊँगा।

जिये मेरा भारत तो मैं रब छोड़ जाऊंगा।

अजमत वतन की मेरे दिल में सिर्फ इतनी है,

अपने वतन को छोड़ सब छोड़ जाऊँगा।

चाहूंगा रखना  मैँ  प्रीत  की  दीवारों को

साँझी विरासत का मैँ दर छोड़ जाऊँगा।

देखी दिखाई अपनी गलियां रकीबों की,

अमन की हिफाजत में अदब छोड़ जाऊंगा।

दर्द  के दयारों  में सवालों की दुनियां है,

जवाबों के जानिब अपनी हद छोड़ जाऊंगा।

उदय वीर सिंह।

सोमवार, 22 अगस्त 2022

अमरबेल सी तेरी छांव...






 ........✍️


बरबस आते स्मृतियों में स्नेह सुरभि के

सुंदर गांव।

तपती किरणों से कवच हमारी अमरबेल

सी तेरी छांव।

ले लेती परछाईंअज्ञातवास जब निशा 

कर्कशा  आती,

पाया हमने कालरात्रि में आगे चलते

तेरे संवेदन के पांव।

समृद्ध  अधर  मुस्कान  सरस रच जाते 

राह विषम वन में,

बतलाता  कौन  पथिक को पथ, सबके 

अपने अपने दांव।

उदय वीर सिंह।

शनिवार, 13 अगस्त 2022

सहारा मिलता.......




 .. .....✍️

काश! सच को जरा सहारा मिलता।

मुल्जिम को जीवन दुबारा मिलता।

न बेचते हम अपना जमीरो ईमान,

तुमको तुम्हारा हमको हमारा मिलता।

न देते हम नफरत के पैगामों को हवा,

तूफान में किश्ति को किनारा मिलता।

झूठ के पांवों को गर पंख नहीं मिलते,

जमाने को पसंदीदा शोख शरारा मिलता।

इंसान को इंसानियत की आंखें मिलतीं,

न होती ऊंच नींच की खाई न बंटवारा होता।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 9 अगस्त 2022

खरांस चली गई....

जब से छोड़ा उनके गीत गले की

खरी खरांस चली गयी।

जब से छोड़ा उनकी लीक 

जीवन की लगी फांस चली गयी।

बन समिधा दे आहुति कुंडों में 

अनुवंधों की, 

भय संशय दुविधा की छाई रात

अमावस ख़ास चली गयी।

कब तक धोते आंसू से मुख, 

कब तक प्यास बुझाते,

तोड़े पत्थर के झुरमुट पा मीठे 

सोते सरित तालाश चली गयी।

पाखंडों के जेवर से जीवन

कितना भारी था,

मैने छोड़ा दरबारी गर्दभ राग,

वो गीत उदास चली गयी।

उदय वीर सिंह ।

9।8।22

बुधवार, 3 अगस्त 2022

अमृत पीकर क्या करेंगे...


 





..........✍️


अर्थ मर जायेंगे तो शब्द जीकर क्या करेंगे।

न रहेगी दुनियां तो अमृत पीकर क्या करेंगे।

जब बारिश  तेजाबी , हवा में मिर्च घुली हो,

दर्द  के  शहर  में जख्म सीकर  क्या करेंगे।

ईश्वर होजाने का यकीन हो जाये आदमी को

उसे आदमियत की नजीर देकर क्या करेंगे।

उदय वीर सिंह।

रविवार, 31 जुलाई 2022

तूफान से मिलकर देखिए...


 





🙏...


कितना सच  सा  लगने लगता है झूठ,
कभी  बे- ईमान  से  मिलकर  देखिए।
किसी दरबारी के सामने बौना लगता है,
कभी किसी  तूफान से मिलकर देखिए।
ईश्वर को ढूंढना न पड़ेगा कभी दर-बदर,
किसी पाखंडी से जुबान लड़ाकर देखिए।
भूख  गरीबी  दहशत  फ़रेब गुमशुदा हुए,
दूरबीन लिए सितारों से मिलकर देखिए।
कितनी रंगत है बुतों की ऊंची फसीलों की,
बदरंग हो गया है इंसान से मिलकर देखिये।
इफरात पानी है लहराता हुआ मरुस्थल में
कभी किसी मृग-छौने से मिलकर देखिए।
उदय वीर सिंह।

शनिवार, 30 जुलाई 2022

मेजबान तो बहुत थे..


 





.......✍️


भूखा-प्यासा ही रह गया इंतजाम तो बहुत थे।

मिलीन पनाह धूप-बारिश में मकान तो बहुत थे।

रिहा हुआ आखिर बेगुनाह अपनी मौत के बाद,

जींद बीती शलाखों के पीछे विद्वान तो बहुत थे।

रोता रहा इंसान रोटी कपड़ा मकान के जानिब

मंदिरों में हिन्दू मसीतों में मुसलमान तो बहुत थे

गुलामी,भूख का इतिहास अतिश्योक्ति तो नहीं

चौकमें गबरू जवान खेतोंमें किसान तो बहुतथे।

गुमनामियों की ही चादर  में मायूस लौट आया
अजीजों की महफ़िल  में  मेजबान तो बहुत थे

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

पीर लोरी सुनाने नहीं आयी,..








 ......,✍️


शमशीर  नींद  से  जगाने  नहीं आयी।

तीर कभी कमान से लुभाने नहीं आयी।

आयी तो बे-मुरौअत अकेने नहीं आयी,

पीर  किसी को लोरी सुनाने नहीं आई।

मन को रौंदती रही गुरबति की जूतियां,

जंजीर तन को  मुक्त कराने नहीं आयी।

दूरियां  मज़बूरियाँ, दहशत  कायम रहे,

प्राचीर  दर  बराबरी निभाने नहीं आयी।

उदय वीर सिंह ।

सोमवार, 25 जुलाई 2022

पत्तों की मुखबिरी


 




.......,✍️


पत्तों की  मुखबिरी  से माली भी डर रहा है।

दरबारियों की फ़ितरत सवाली भी डर रहा है।
जमाने से दर -बदर वो  इंसाफ  मांगता है,
पाए तो पाए कैसे हाथ खाली जो डर रहा है।
इन हवाओं का क्या भरोषा बहने लगें किधर,
उनके  तेजाबीपन  से मवाली भी डर रहा है।
कीचड़ भरी हैं सड़कें रकीबों से  भरे दयार
बेहूरमतों की दहशत जलाली भी डर रहा है।
उदय वीर सिंह

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

मुगालते में था...







🙏......


तेरी ख़ामोशियों के पीछे कौन है मुगालते में था।

इल्मो हुनर शराफत,वफ़ादारी मुगालते में था।

शीशे की दीवारों का बे-तरह टूट बिखरा मंजर,

भीड़,पत्थरों की कवायद होगी मुगालते में था।

रिश्तों  का  टूट  जाना  उनका बेसुरा हो जाना,

तलाक की वज़ह तवायफ़ होगी मुगालते में था।

उदय वीर सिंह।

रविवार, 10 जुलाई 2022

कहूँ तो कैसे..





 ....कहूँ तो कैसे..✍️

है साजिशों  की  सान  सम्मान  कहूँ

तो कैसे।

जब  पीना  विष  का  जाम आसान 

कहूं तो कैसे।

दर्द गरीबी ऋण रोग आभूषण सतर 

बनाते बखरी,

याचन जिनकी नियति बनी अपमान 

कहूँ  तो कैसे।

तन, मन, वंधक  जिनका  उपयोग 

पराए हाथों में,

यकृत हृदय कलेजा बिकता सामान 

कहूँ तो कैसे।

होंठ खुले तो विष तीर अनेकों भर 

जाएंगे आनन,

भूख यतिमी अनजानापन उनकी 

पहचान कहूँ तो कैसे।

आदर्शों की प्राण वायु दे जाती है

स्वांस श्लेष 

हैं बिन रोटी कपड़ा और मकान 

उनका हिंदुस्तान कहूँ तो कैसे।

उदय वीर सिंह।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

इश्तिहार दे गया


 




....✍️


सुलझे हुए शहर में कोई  इश्तिहार दे गया।
थी  प्यार की  जरूरत वो हथियार दे गया।
उधड़ी हुई कमीज संग उलझा हुआ रफूगर,
टाँकने थे बटन कमीज के तलवार दे गया।
इस छोर से उस छोर तक बहती रहीं बेफिक्र
हवाओं  को  रोकने को कई दीवार दे गया।
ताजी ख़बसर में क्या है शरगोशियाँ लबों पे
बिखरे पड़े हैं दर-दर बासी अखबार दे गया।
उदय वीर सिंह।
7।7।22

सोमवार, 4 जुलाई 2022

हलाहल पीना है...

 







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कंपित मझधार सफ़ीना है।

सच बोल हलाहल पीना है।

तेजाबी बारिश का आलम

बे-चैन  परिंदे  दर  ढूंढ रहे,

पूछ  रहे  घर  कौन  हमारा,

पर  काशी  मौन मदीना है।

बेड़ी पांव हाथ हथकड़ियां

रांह  कंटीली  खंडित  पथ,

हैं आंसू स्रोत नीर के बनते,

अधरों  को  अपने सीना है।

उदय वीर सिंह।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

हरियाली यूँ नहीं आयी


 




........यूँ नहीं आयी.✍️


पेड़ों के हर पात पर हरियाली यूँ नहीं आयी।

कांटों के बीच गुलाब पर लाली यूँ नहीं आयी।

अपने वजूद को ही दफ़्न कर दिया  मिट्टी में,

जड़ों के नाम कोरी  गुमनामी  यूँ नहीं आयी।

तूफानों की नफरत ने जलने न दिया पलभर

बुझे दीये झोपड़ों में रात काली यूँ नहीं आयी।

गुजर गए कितने जमाने मसर्रत के इंतजार में

अक़ीदरमंदों के  लबो से गाली यूँ नहीं आयी।

उदय वीर सिंह।


गुरुवार, 30 जून 2022

क्या बनना था ..

 





......✍️




क्या बनाना था इसे क्या बनाकर रख दिया।
फूल रखने थे जहां कांटे बिछाकर रख दिया।
हसरतों की छांव में कुछ पल बिताने की कशिश,
खोलना था द्वार को ताला लगाकर रख दिया।
दे दी दवा हकीम ने ख़ैरात की झोली समझ,
प्यास में मदिरा मिली पानी छिपाकर रख दिया ।
ढूंढते मंजिल मुसाफ़िर राह उनकी गुमशुदा,
राह में दीपक जलाया फिर बुझाकर रख दिया।
उदय वीर सिंह।

शनिवार, 25 जून 2022

सच्चा सरदार मिलता है


 





........✍️

नसीब से काफिलों को सच्चा 

सरदार मिलता है।

इम्तिहानों के बाद जमाने को 

एतबार मिलता है।

आसान नहीं है उतारना जहालत 

के पर्दों को,

दिलवालों की ही जिंदगी में सोणा 

प्यार मिलता है।

ख़ामोशियां इसरार का सबब बन

जाती हैं,

जब उठती है आवाज तो कामिल 

अधिकार मिलता है।

गिरवी जमीर से इंसाफ की उम्मीद 

बेमानी है,

हकपसंदों को सलीब कमज़र्फ को 

पुरस्कार मिलता है।

उदय वीर सिंह।

शुक्रवार, 17 जून 2022

बंजर होती संस्कृति (कहानी संग्रह)


 




🙏सतनाम श्री वाहेगुरु जी !

  " बंजर होती संस्कृति"

मेर नवीन कहानी संग्रह

प्रिय सुधीजनों, मित्रों, स्नेहियों!  खुशी के पल आपसे साझा करते हुए हर्षित हृदय से आप सबके स्नेह व सम्मान का ऋणी हूँ। 

  मेरे बहुप्रतीक्षित  नवीन कथा संग्रह " बंजर होती संस्कृति " का प्रकाशन हो ही गया। उसकी प्रतियां आज मुझे प्राप्त हुईं। पुस्तक  आवरण, संक्षिप्त विन्यास आप सबके अवलोकनार्थ संप्रेषित कर हृदय आह्लादित भावों से भर उठा। 

पुस्तक का प्रकाशन स्वनामधन्य प्रकाशन  " हंस प्रकाशन " से हुआ है। ख्यातिलव्ध प्रकाशन व माननीय प्रकाशक का हृदय से आभार  ।

    यह कथा संग्रह भी पूर्व रचना कृतियों की तरह आप सबके स्नेह से सिंचित होगा ऐसा मेरा दृढ़ विस्वास है। 

  मैं कितना आपके मानदंडों पर खरा उतरा हूँ ,आपकी आलोचना समालोचना, प्रतिक्रिया की मुझे प्रतीक्षा रहेगी। 

    पुनः सर्वोपरि श्री गुरुग्रंथ साहिब जी महाराज की छांव , गुरुशिक्षकों ,परिजनों पाल्यों, सम्बन्धियों मित्रों सुधि- पाठकों शभचिन्तकों को मेरा विनीत भाव से नमन व हृदय से आभार।

उदय वीर सिंह।

शनिवार, 11 जून 2022

दिन चैन के कमतर हुए...








.........✍️


आंसुओं  के ढेर  पर ही तामीर  मुर्दाघर हुए।

दीन की चाहत लिए आबाद इबादतघर हुए।

रहबरी शमशीर के हाथ जब भी काबिज हुई,

खून की नदियां बहीं दिन चैन के कमतर हुए।अपनी ही बुनियाद की मज़बूतियाँ भी देखना

पत्थर लगे थे शोध कर हिलने लगे जर्जर हुए।

न सहेजा न तराशा सब आकर्षण चला गया,

दामन भरे थे फूल से कैसे हाथ में पत्थर हुए।

जन्मदात्री है बिखराव की गुरुत्वाकर्षणविहीनता

जो  ग्रह  थे परिक्रमा में टूट  तीतर-बितर हुए।

देख लेते एक बार अपने घर की गिरती दीवार

बंद आंखें मुस्कराते रहे घर कंगूरे खंडहर हुए।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 31 मई 2022

शीशे पर वार करते हो।






 .........✍️


अगर  तुम पत्थर पर ऐतबार करते हो।

एक  मुकद्दस  शीशे पर  वार करते हो।

टूट  कर बिखरने  का दर्द मामूली नहीं,

वादियों में खिजां का इंतजार करते हो।

भूख है तो आग से भी खेलना होता है,

आग से नहीं  रोटियों से प्यार करते हो।

उदय वीर सिंह।

रविवार, 29 मई 2022

बेजुबां नहीं हो....


 





.........✍️


अपनी लिखो मुकद्दर, 

लिखता रहा है  कोई।

मालिक हो अपने घर के 

रहता रहा है कोई।

बेजुबां नहीं हो तुम,

बेजुबां से हो गए हो,

खोलो भी अब जुबां को

कहता रहा है कोई ।

हालात से है वाकिफ़

दर्दे सफ़र तुम्हारा,

अपनी कहो जुबानी ,

कहता रहा है कोई।

ये बे-अमन की आग

बोई है किसने वाइज,

जलना था इसमें किसको,

जलता रहा है कोई।

उदय वीर सिंह।

शुक्रवार, 27 मई 2022

पुजारी देखता है....


 




......✍️

नफ़ा और नुकसान को व्यापारी देखता है।

रास्ता निज आराध्य का, पुजारी देखता है।

इशारों में मुकर्रर कर देता है सजा उनकी,

बेजुबानों की आखों में मदारी देखता है।

बिछाई जाल ऊपर दाने शीतल नीर भी,

घात लगाये बैठा दूर शिकारी देखता है।

मीर चश्मों से देखता क्या शेष झोपड़ी में,

मुफ़लिस प्यार से मीर की अटारी देखता है।

उदय वीर सिंह।

सोमवार, 23 मई 2022

शामिल न हुए







 .........✍️

मांग  रही बर्बादी  की उस अरदास में 

हम शामिल न हुए।

वंचित करती जीवन को उस न्यास में 

हम शामिल हुए।

लांछित करती गरिमा को उस प्यास में

हम शामिल न हुए।

अवरोध  बने  परवाज़ों के, आकाश में 

हम शामिल न हुए।

प्रतिदान  मिलेगा क्या हमको उस आश

में हम शामिल न हुए।

अश्लील सृजन की बेदी  के विन्यास में 

हम शामिल न हुए।

छद्म  समष्टि  की  गाथा उस सन्यास में 

हम शामिल न हुए।

श्रम- बिंदु के कोपल कंचन के परिहास 

हम शामिल न हुए।

उदय वीर सिंह।

शुक्रवार, 20 मई 2022

दिगम्बर हो रहा है...


 






.......✍️

था भरोषे की शाल में दिगम्बर हो रहा है।

ज़हर बंद था शीशी में समंदर हो रहा है।

जरूरत  थी  नख़लिस्तान  कि  सहरा में,

शीतल पवन का झोंका बवंडर हो रहा है।

जरूरत  थी आग  की बुझे हुए  चूल्हों में,

जल रही है ज़मीन मौन अम्बर हो रहा है।

तंजीमों का रंगमंच भीअब रंगीला हो गया,

सिकंदर हो रहा , कोई  कलंदर हो रहा है।

उदय वीर सिंह।

गुरुवार, 19 मई 2022

आग ही आग है,...


 





रास्ते  तंग  हैं , आग  ही  आग है,

बेबसी  बो  रहा आदमी के लिए।

सूर तुलसी के घर - द्वार ही बंद हैं,

जायसी ,मीर  की शायरी के लिए।

गंगा यमुना की धारा किधर जा रहीं,

आदमी  कुफ़्र  है  आदमी के लिए।

थे किताबों के आलिम कहाँ खो गए,

फ़र्ज़  गुमनाम  हैं, आदमी के लिए।

शहर  के  शहर  वहशियों  के  हुए,

मुख़्तसर आदमी, आदमी के लिये ।

उदय वीर सिंह।

रविवार, 15 मई 2022

चिराग भी जल रहे हैं...


 

.........✍️


आंधियां चल रही हैं चिराग़ भी जल रहे हैं।

आंधियों से  ही बल चिराग़ों को मिल रहे हैं।

कांटों  की सेज से भी गमो रश्क नहीं कोई,

नींद  बहुत गहरी है, ख़्वाब भी  मचल रहे हैं।

कम  न  होंगे  कभी शीशों के  दीवारे शहर,

सुना है शर्मसार हो पत्थर भी पिघल रहे हैं।

उम्र  फ़रेब की बहुत लंबी नहीं होती मितरां,

पर्वतों  के भीतर बहुत  सोते भी पल रहे हैं।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 10 मई 2022

बाजार हो गया


 




...✍️


कल  आंगन  था  आज बाजार हो गया।

गोपनीय  दस्तावेज था अखबार हो गया।

लगने लगी हैं  बोलियां  नींव  के ईंटों की,

कल साहूकार था आज कर्ज़दार हो गया।

धरती भी वही आसमान भी वही तालिब

कल फलदार था शज़र कांटेदार हो गया।

टूट जाएंगी वर्जनाएं कुछ इस  तरह  बेदम,

कल  कंगन  था  आज  कटार हो गया।

उदय वीर सिंह।

रविवार, 8 मई 2022

मां के साथ ..मां के बाद

 







..मां के साथ ..मां के बाद.✍️

मां, मां ही नहीं एक पूरी 

कायनात होती है।

जब जिंदगी में धूप होती,

मां बरसात होती है।

गर कुछ बे-हिसाब होती है 

मां की दात होती है।

मुक़द्दर भी खौफ़ में होता,

जो मां की बात होती है।

मां कहती है न भूल रब को

जब अरदास होती है।

जब भी ग़मज़दा होता हूँ 

मां पास होती है।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 3 मई 2022

शिखर सम्मान " पंडित तिलक राज शर्मा स्मृति न्यास"






🙏.....

कुछ अनमोल पलों में एक पल यह  भी कि  " पंडित तिलकराज शर्मा स्मृति न्यास " (संयुक्त राज्य अमेरिका)  के चयन मंडल द्वारा मुझे 2022 के लिए " शिखर सम्मान "  मेरे ( साहित्यिक योगदान हेतु ) चयनित किया गया है। इस सम्मान से  दिनांक 30 अप्रैल 22 को दिल्ली में त्यागी पब्लिक स्कूल के सभागार में मुझे विभूषित किया गया।   

    सम्माननीय न्यास के अध्यक्ष पंडित इंद्रजीत शर्मा जी, संरक्षक श्री डॉ आशीष कंधवे जी, संरक्षक श्री प्रेम भारद्वाज ज्ञानभिक्षु जी  व चयन मंडल का  हृदय से आभार ज्ञापित करते हैं।

  " शिखर सम्मान " अन्तराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शिक्षाविद माननीय श्री हुकुमचंद्र गणेशीया जी,  शिक्षाविद प्रोफे. उदय प्रताप सिंह जी, शिक्षाविद प्रोफे. डी एन दीक्षित जी ,स्वनाम धन्य महान समाज सेवी पंडित इंद्रजीत शर्मा जी, व सुविज्ञ शिक्षा विद, ख्यातिलव्ध संपादक ,आलोचक,(मुख्य संपादक अंतराष्ट्रीय पत्रिका गगनांचल) ,नव नियुक्त सांस्कृतिक निदेशक( भारत सरकार) डॉ आशीष कंधवे जी ,तथा समाजसेवी प्रेम भारद्वाज ज्ञानभिक्षु जी ,ख्यातिलवद्ध योगगुरु स्वामी सूर्यदेव जी व प्रसिद्ध कवि सुनील जोगी जी द्वारा  बड़े सम्मान व आदर से प्रदान किया गया।

  अभिभूत हूँ इस आदर सम्मान से विभूषित होकर,निश्चय ही इसमें वाहेगुरू व आप सभी शुभेच्छुओं का अप्रतिम स्नेह व आशीष शामिल है। कृतज्ञ हैं हम आप सके प्रति।

    सदैव की भांति प्यार सदैव मिलता रहेगा मेरा विस्वास है। परमात्मा से आप सबके लिए शांति स्वास्थ्य खुशहाली की अरदास करता हूँ। गोरखपुर गृह वापसी के बाद ये खुशी के क्षणआपसे साझा करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। खुशी होगी आपकी आशीष पाकर।

उदय वीर सिंह।

गोरखपुर ।

 

गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

सरमायेदार किधर गए..







..सरमायेदार किधर गए..✍️ 

किश्तियाँ  किधर  गईं  पतवार किधर गए।

नदिया  किधर  गयी  किनार  किधर  गए।

फरियादी  खाप  में  लंबरदार  किधर  गए।

सौंपीअमानत किधर, रखवार किधर गए।

इज्जत खूंटियों पर इज्ज़तदार किधर गए।

जर्द पत्ते दरख़्तों पर सदाबहार किधर गए।

धर्म आमने-सामने खड़े,ठेकेदार किधर गए।

लथपत खून से दोनों तीमारदार किधर गए।

संहिता की पोटल सिर अधिकार किधर गए।

बाजार में  खामोशी है खरीददार किधर गए।

यतिमी का उगा जंगल सरमायेदार किधर गए।

खबर की तलाश में ख़बरअखबार किधर गए।

उदय वीर सिंह।

रविवार, 17 अप्रैल 2022

ठेका कौन लेगा...


 




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जब  तुम्हें किसी  की  परवाह  नहीं, 

तो तेरी परवाह का ठेका कौन लेगा।

मुतमईन  हो शाख  की शोखियों पर,

दरख़्त के निबाह का ठेका कौन लेगा।

यकीन नहीं रहाअख़बार तकरीहों पर,

सरगोशीअफ़वाह का ठेका कौन लेगा।

किसी  शहर  मजरे गांव के हुए नहीं,

तेरे  निकाह  का  ठेका  कौन  लेगा।

रुखसत हो गए फकीरों दरवेश दर से,

खाली पड़ी दरगाह का ठेका कौन लेगा।

उदय वीर सिंह।

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

गुड़ फ्राइडे

 




🙏

ईसाई मतावलंबियों व उनके प्रशंसकों को उनके महान पर्व ( good friday )की  बधाई व शुभकामनाएं। प्रेम,करुणा दया  शांति व वलिदान को समर्पित यह पर्व समस्त मानव जाति को प्रेरित करता रहे,मेरी कामना है।

शत शत नमन🌷

उदय वीर सिंह।

गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

अप्रतिम बैसाखी




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बैसाखी की लख लख बधाई मित्रों!

बैसाखी एक सरल अद्दभुत प्राचीन होकर भी सदैव, नवीन, अप्रतिम, मोदमयी ही नहीं एक लोमहर्षक शब्द, लबों पर आते ही असीम ऊर्जा ही नहीं अनंत संभावनाओं से हृदय को भर देता है। यह शब्द धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक ही नहीं बौद्धिक पयामों की सार्थकता को समग्र रूप से परिभाषित करता है। यह शब्द किसी विद्वान, सत्संगी, पैरोकार या बादशाह की दरबारी मोहब्वत या परिभाषा का कत्तई मोहताज या आश्रित नहीं। आप स्वयं इसे दिल से स्पर्श करें स्व स्फूर्त विवेचित होता चला जाता है। बैसाखी एक मानसिक उच्चतम संवेदना है, इसकी प्रशंसा में किसी नाम को उध्दृत करूँ अन्याय होगा।

  " खालसा पंथ " की साजना कर दशम पातशाह गुरुगोबिंद सिंह साहिब जी ने मानव-मात्र को धार्मिक,राजनैतिक, सामाजिक क्षितिज को नैशर्गिकता प्रदान कर सास्वत जाग्रत ज्ञान-सूर्य का अनंत आकाश दिया। समाज में व्याप्त तमाम पाखंडों, कुरीतियों, मिथकों को खंडित किया तथा  नई समरस सजग पारदर्शी निष्पक्ष राह का सृजन किया। 

" ..वाह वाह गोबिंद सिंह आपे गुरू चेला "

   परिणाम परिभाषित करने की यहां आवश्यकता नहीं सारा विश्व सिक्खी खालसा से प्रभावित, आलोकित व मुदित है। सर्वशक्तिमान देश अमेरिका द्वारा साजना दिवस " बैसाखी " को " अंतराष्ट्रीय सिक्ख दिवस " घोषित किया जाना निश्चित ही सिक्खी संस्कारों, मूल्यों को पुष्ट करता है।

सिक्खी पोषित करती है- " मानुष की जाति सब एकै पछानिबो " 

   बैसाखी खुशहाली का पैगाम लेकर आती है क्योंकि रबी मौसम की फसलों के पक कर कटाई का समय होता है। घर में धन धान्य आता है अरमान, स्वप्न पूरे होते हैं,शादी ,कुड़माई निर्माण, पढ़ाई, दवाई का पुख्ता इंतजाम कर बैसाखी घर पधारती है। आखिर दिल पलक पांवड़े बिछा स्वागत क्यों न करे।

बैसाखी सांझी संस्कृति का उद्दात स्वाभिमानी स्वरूप ही नहीं एक दर्शन है। जिसके आलोक में मानवीयता के उच्चतम स्वरूप को प्रदर्शित किया गया। आजादी की क्रूरतम हथकड़ियों बेड़ियों को चाहे मुसलमान शासक रहे या अंग्रेजी हुकूमत ,अपने अप्रतिम त्याग वलिदान संस्कारों  से बैसाखी की अमिट युगांतकारी तिथियों 13 अप्रैल 1699 खालसा पंथ (सिक्खी)  आनंदपुर साहिब व 13 अप्रैल 1919 जलियांवाला बाग  (अमृतसर )ने  अपना अकल्पनीय स्वरूप प्रदर्शित कर उच्चतम प्रतिमान स्थापित किया।

आज विश्व का कोना कोना सिक्खी स्वरूप से प्रभावित व उसके संस्कारों मूल्यों से सहमत ही नहीं अनन्य प्रशंसक है। त्याग समर्पण सेवा प्रेम की अद्दभुत मशाल बन हर अंधेरे में, हर पथ पर गुरु-सिक्खी दिखाई देती है।  हर आपदा, पीड़ा, युध्द-पीड़ितों,असहायों शरणार्थियों के दुख में भारत ही नहीं पूरी दुनियां में  यथा अमेरिका कनाडा रूस अफ्रीका आस्ट्रेलिया यूक्रेन  हंगरी पोलैंड फ्रांस जर्मनी किनियाँ फिजी आदि ...में अपनी उच्चतम सहभागिता बिना स्वार्थ, लोभ, मोह दर्ज कराती रही है। उदाहरण अनगिनत हैं। 

   विस्वास का अप्रतिम स्रोत कहीं है वह गुरु घर ही है, गर्व है हम उस गुरु घर के वारिस हैं।

  पुनः समस्त मानव जाति को बैसाखी की हृदय से बधाई व शुभकामनाएं ।

उदय वीर सिंह।

14/3/2022

रविवार, 10 अप्रैल 2022

आग शीतल नहीं होती...


 






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आग  कोई  भी  हो शीतल जल नहीं होती।

जलाती है तन-मन कभी निष्फल नहीं होती।

पाखंड और  झूठ  की आग के क्या कहने,

पाक उतनी जैसी गंगा भी निर्मल नहीं होती।

उन्माद और अहंकार की आग ही निराली है,

स्व - विध्वंश के बाद भी  निर्बल नहीं होती।

आग  ईर्ष्या व डाह की  खामोशी बेमिशाल,

जली जमीन  फिर  कभी  उर्वर  नहीं होती।

क्रोध अधर्म क्रूरता की आग का सानी नहीं,

जली मनुष्यता तो कभी उज्वल नहीं होती।

उदय वीर सिंह।

शनिवार, 9 अप्रैल 2022

गंगो जमन कहिए..


 





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बिछाकर बारूद उसे गुले गुलशन कहिए।

तेज़ाब की बूंदों को मासूम शबनम कहिए।

जहां  बंद  हों  सारे  दरवाजे सवालियों के,

उसे  इंसाफ  का कामिल अंजुमन कहिए।

दफ़्न  हो रही हैं जहां मसर्रतों की दुनियां,

उन्हें बंजर नहीं हंसता हुआ चमन कहिए ।

लिखी जाएं आदिमता  की तल्ख इबारतें,

इन्सानियत के वरक पर दौरे सुखन कहिए।

इंसानियत को छोड़ सब जायज हो जाएगा

बहती हों खून की धार गंगो जमन कहिए।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

अधिकार पाना चाहता...


 




🙏🏼नमस्कार मित्रों!


बुलबुलों की नाव से उस पार जाना चाहता।

कल्पना के दीप से उजियार पाना चाहता।

कैद  है  प्राचीर  में दासता - ए- नींद  की

दफ़्न करके हौसले सिंहद्वार पाना चाहता।

मौत की आवाज से कांपते हैं पांव थर थर

आंसुओं की धार ले अधिकार पाना चाहता।

बेड़ियां हैं स्वर्ण की मुस्करा रहा है डाल कर

बेच  करके  आत्मा  संस्कार पाना  चाहता।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 29 मार्च 2022

वक्त के मुताबिक...


 





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रश्म टूट जाएगी,रश्म  बना ली जाएगी।

गर नशा कम हैअफ़ीम मंगा ली जाएगी।

खुला रहना दिल का, इतना अच्छा नहीं,

बीच में एक ऊंची दीवार उठा ली जाएगी।

मंचों की भी अपनी अलबेली संस्कृति है,

आंखों में थोड़ी ग्लिसरीन लगा ली जाएगी।

एक सच्चा हमदर्द होने का फन आला है,

वक़्त के मुताबिक तस्वीर लगा ली जाएगी।

उदय वीर सिंह

बुधवार, 23 मार्च 2022

प्रणाम शहीदां नूँ






 🙏कोटिशः प्रणाम शहादत दिवस( 23 मार्च 1931)पर शहीदे आजम सरदार भगत सिंह ,राजगुरु सुखदेव अमर वलिदानियों को...🌷

** मेरे जज्बातों से वाकिफ है कलम मेरी,

इश्क़ लिखना चाहूँ इन्कलाब लिखा जाता है ।**

- शहीदे आजम भगत सिंह।

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शहीदे आजम तुम्हें खोकर बहुत रोया है चमन,

तेरे दीये की रोशनी आफ़ताब हो रही है।

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बर्बाद न कर सकी हिन्द को हुकूमते नामर्द,

चले मर्द मसीहा-ए-इंकलाब चमन आबाद करके।

उदय वीर सिंह।

शुक्रवार, 18 मार्च 2022

रंग पर्व





🙏🏼 रंग पर्व की दिली मुबारकबाद मित्रों 🌷

दरमियाँ फासले ना हों दिल से दूर कीजिये।

लिए सौगात रंगों की प्रीत भरपूर कीजिये।

कुछ हम आएं कुछ आप जमाना चाहता हमसे,

नफ़रत भूल जाने की सदा मंजूर कीजिये।

मुख़्तलिफ़ रंग देते हैं गुलो गुलशन संवरता है ,

तिजारत प्रीत की रोकें हमें मजबूर कीजिए।

सियासत छोड़ जाती है बहुत से दाग जिस्मों पर

मरहम दे मोहब्बत का उदय मशहूर कीजिये।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 15 मार्च 2022

चिरागों को पहचान देते हैं...


 





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अहसानमंद हैं हम अंधेरों का,

चिरागों को पहचान देते हैं।

उन कदमों का  दर शुक्रिया,

जो मंजिलों के निशान देते हैं।

वो दिल मिटा अपना वजूद,

जमीन आसमान देते हैं।

वो आंखें देकर अपनी जोत,

दूसरों को रोशन जहान देते हैं।

उन ज़ख्मों का लख शुक्रिया

जीने को पायदान देते हैं।

अहसान उन फलसफ़ों का,

जो जमाने को इंसान देते हैं।

उदय वीर सिंह

शनिवार, 12 मार्च 2022

कुछ सिख ले




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कुछ तो जिंदगी के गीत ,गाना सिख ले।

लुटेरों की गली सेआना-जाना सिख ले।

मंडियों में आंसुओं का,कोई मोल नहीं,

झूठ ही सही गम में मुस्कराना सिख ले ।

हो इल्मदां पर तुम्हें दाद  मिलने से रही,

दर मनसबदारों के सिर झुकाना सिख ले।

आदमी को आदमी से सिर्फ प्यार इतना है

घर जले और का अपना बचाना सिख ले।

ले जाएगा ये मुकाम किस दहलीज पर,

महशर ले लिए कुछ बातें बनाना सीख ले।

उदय वीर सिंह।

गुरुवार, 10 मार्च 2022

मंजर याद आये,..


 




..मंजर याद आये...✍️

जितना कुरेदा जख्मों को 

वो मंजर याद आये।

अपनों के हाथों में सजे

खंजर याद आये।

बहारों ने छीन ली हमसे,

जगह दी वो बंजर याद आये।

बिना दीवारों के कैद रहा,

वो पिंजर याद आये।

नीलाम करते आबरू ,

वो सिकंदर याद आये।

मुख्तसर न हुई जुर्म की मंजिल

वो नश्तर याद आये।

रहे जालिमों के हमनवा,

वो कलंदर याद आये।

देखती रही कायनात डूबते,

आँसुओं के समंदर याद आये।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 8 मार्च 2022

मुश्किल बना दिया...


 





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राहें मुश्किल थीं,या हमने मुश्किल बना दिया।

काम आ जाती किश्ती अपने हाथों जला दिया।

जिसने वज़ह दी हंसने की बाद बर्बादियों के,

ख़ामोशियों की दे हवेली उसे हमने रुला दिया।

कहा था भूल जाना,ये दुनियावी मेले हैं वीर!

उसने तो याद रखा, मगर हमने भुला दिया।

नफ़ा नुकसान की तिजोरियों को सहेजते रहे,

नफ़ाअपना उसे नुकसान का सिलसिला दिया।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 1 मार्च 2022

ठहरा दिखाई देता...

 

ठहरा दिखाई देता...



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बहता दरिया प्रीत का, ठहरा दिखाई देता।
बुलबुला किस काम का सुनहरा दिखाई देता।
आगे आग और धमाके,फिर भी जा रहा है,
इंद्रियों से शायद जातक बहरा दिखाई देता।
कभी इधर तो कभी उधर नजरें घुमा रहा है,
होठों पर मुस्कराहट सदमा गहरा दिखाई देता।
हर हाथ में परोसे अब हथियार जा रहे हैं,
तालीम की दहलीज पर पहरा दिखाई देता।
गुमनाम हो रही कहीं आदमियत की तासीर,
विनाशकों का आज झंडा फहरा दिखाई देता।

उदय वीर सिंह।