रविवार, 29 जनवरी 2023

" बंजर होती संस्कृति "






 🙏🏼 नमस्कार सुधि मित्रों!

क्षमा प्रार्थी हूँ आप सभी सुधि मित्रों स्नेहियों का ,मेरी पुस्तक  " बंजर होती संस्कृति " (कहानी संग्रह )सरलता से उपलव्ध होने में देर व कठिनाई हुई। पुस्तक आमेजन व फ्लिपकार्ट पर अब उपलव्ध है।आप इसे अब प्राप्त कर सकते हैं। दिल्ली के स्नेही जन ,पाठक इसे हंस प्रकाशन /डिस्ट्रीब्यूटर से भी आसानी से ले सकते हैं। सुदूर के मित्र नीचे दिए लिंक से प्राप्त कर सकते हैं।-

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  आप सभी से निरंतर प्राप्त हो रहे प्यार व शुभेक्षाओं का सदैव ऋणी हूँ।आपका निर्देश व अनुशंसाएं सर्वथा स्वीकार।

उदय वीर सिंह।

फ़िजाएँ बेईमान लगती हैं...







 🙏🏼नमस्कार मित्रों !

मुकद्दस  हवाएं  भी परेशान लगती हैं।

पातों की खड़खड़ाहट तूफान लगती हैं।

आग से शोर तो लाजमी है  बस्तियों में,

महलों की कैफ़ियत शमशान लगती हैं।

गिर रहे पत्ते पेड़ों  से कितने जर्द होकर,

ये फ़िजाएँ बसंत की  बेईमान  लगती हैं।

उड़ रहे परिंदे दरख़्तों से,पा कोई आहट,

आरियों की आमद शाखें नीलाम लगती हैं।

कागज़ी फूलो गुलशन का जमाल कायम,

गंध-पसंद तितलियां  मेहरबान लगती हैं।

उदय वीर सिंह ।

शनिवार, 28 जनवरी 2023

समाचार हो गया....


 





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पन्ना  मेरी जेब का अख़बार हो गया।

दर्द मेरा अपना था समाचार हो गया।

मैंने दर्द में दीआवाज कोई नहीं आया , 

मेरी खुशी से सबका सरोकार हो गया।

खंडहरों ने भी मना किया पनाह देने से

तूफान से तबाह मेरा घर-बार जो गया।

सब लौटआये छोड़कर मुझे जाने वाले,

जब  कामयाब  मेरा कारोबार हो गया।

चले गए बे-मुरौअत मेरा हाथ छोड़कर,

जब मेरे  ऊपर ढेर सारा उधार हो गया।

मैं  छोड़ आया बे-फिक्र बहारों की गली

जब  कांटो  पर  मुझे पूरा ऐतबार गया।

नासमझ था खुली थी जब अपनीआंखें 

बंद कर ली आंखें  समझदार जो गया।

उदय वीर सिंह।

शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

आजादी जिंदाबाद...


 





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लिखना चाहूँ प्रेमगीत कोशिश बेकार जाती है।

हमारी  जज्बातों  की  मारी कलम हार जाती है।

पत्थरों  ने  सजा दी  उसे न जाने किस बात की,

अपनी पूछने  गुस्ताखियां  वह हरिद्वार जाती है।

मंसूख हो जाएगी अर्जी पहले भी कईबार भेजी,

ये जान कर भी उस दहलीज कई बार जाती है।

बिछाती है ओढती है अपनी हमसफ़र मुफलिशी

चाहती अपनाआशियाना  महँगाई मार जाती है।

उदय वीर सिंह।

रविवार, 22 जनवरी 2023

सालार बनता गया...








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साज़िशों की आग,आदमी लाचार बनता गया।

जब ना रही दीवार झोंका रफ़्तार बनता गया।

ख़ामोश लबों की मजलिस का हस्र हुआ वीर,

तालिबों अदीबों का,गूंगा सालार बनता गया।

दाग़दारों ने मनाया जश्न जबआईना तोड़ा गया,

राग - दरबारी मिलते गए  दरबार बनता गया।

चली जहालत की आंधियां, टूटने लगे उसूल,

जब मूल्य बिकने लगे घर,बाजार बनता गया।

टूटी हमदर्दी की हर कड़ी दर्द की सर्दियां आईं

मसर्रत आयी फासला रिश्तेदार बनता गया।

उदय वीर सिंह।

21।1।23

शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

जाल पर्दे में है।


 



..मशाल पर्दे में है..✍️


अंधेरा तब तक है जबतक मशाल पर्दे में है।

ख़ामोशी तबतक है जबतक सवाल पर्दे में है।

सड़कें उदास, सन्नाटों से भरी ,माजरा क्या है,

वीरानगी तबतक है,जबतक जमाल पर्दे में है।

रंगों शबाब महफ़िल का मुकम्मल नहीं हुआ,

जश्न आधा अधूरा है जबतक गुलाल पर्दे में है।

हर जुबां तहरीरो वरक तस्दीक में नज़र आये,

बुलंदियां  ख़्वाब हैं जब तक ख़्याल पर्दे में है।

बहेलिए की मकबूलियत इश्तिहारों से मिली,

दाने तो ऊपर-ऊपर दिख रहे जाल पर्दे में है।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 17 जनवरी 2023

सभागार वहशी जो जाए...


 




........✍️

सभागार वहशी हो ..

क्या  होगा सत्य का जब 

समाचार वहशी हो जाये।

क्या होगा कलम का जब 

अख़बार वहशी हो जाये।

क्या होगा निति व नियोगों 

का जब वो कर्क बनने लगें,

क्या होगा द्रौपदी का जब,

सभागार  वहशी  हो जाये।

क्या होगा मुसाफ़िरों का जो

सिम्त वसूलने लगे खिराज,

क्या  होगा साँसों  का  जब

बयार  वहशी   जो   जाये।

मुखबिर  हो  जाये दहलीज

दे  जब  आंगन  ही  रुसवाई

क्या  होगा  मंगल कंगन का

जब  कटार  वहशी हो जाये।

उदय वीर सिंह

शनिवार, 14 जनवरी 2023

काल -कथा है कहने दो...






 काल-कथा है कहने दो..✍️

सरिता है मत अवरोध बनो

धारा अपनी बहने दो।

हर तट तीरथ की अपनी

काल-कथा है कहने दो।

काल-खंड के भावों को 

व्यक्त किया अनुरागों से,

क्या लिखा है पाती जातक

पढ़ रहा है पढ़ने दो।

जीवन को कारागार नहीं

द्वेष-मुक्त शिक्षालय हो

समता की उर्वर वसुधा में

अभेद वृक्ष को पलने दो।

आडंबर पाखंडों की ध्रुव,

अनुशंसा प्रतिबंधित हो,

क्यों संशय है कुंदन पर 

ताप अनल के जलने दो।

सत्य अनावृत होता हो,

 करतल ध्वनि की गूंज उठे

असत्य,प्रलाप,प्रपंचों को

अग्निशिखा में जलने दो।

उदय वीर सिंह।

बुधवार, 11 जनवरी 2023

नसीब लिखने लगे.....




 🙏🏼नमस्कार सुधि मित्रों !


कल तक थे दोस्त ,रक़ीब लिखने लगे।

कलमआयी हाथ तो नसीब लिखने लगे।

अमीरों  की  फेहरिश्त  में नाम जिनका,

सुन मुनादी ख़ैरात की गरीब लिखने लगे

दी हवा सारेआम आगजनी की जिसने,

रहजनों के सालार तहजीब लिखने लगें।

ये दौर भी गिरावट बदला तो खूब बदला

अदीब जांनिसारी के अजीब लिखने लगे।

उदय वीर सिंह।

रविवार, 8 जनवरी 2023

चिराग़ों का मिजाज अपना है...


 



🙏🏼नमस्कार सुधि मित्रों !


ख्वाहिश नहीं कोई सूरज  ,चांद होने  की,

दहलीज के चिरागों का मिज़ाज अपना है।

खून  और  आसुओं  का  मुजस्सिम  नहीं,

कायम रहे दस्तार सिर का ताज अपना है।

जरूरत  नहीं  किसी  संगीत वाद्य यंत्रों की,

अलबेली  कोयल  का  सुर साज अपना है।

करते फतह मंजिल मुश्किलों को तार करके,

राहअपनी ही चले उनका अंदाज अपना है।

उदय वीर सिंह।