गुरुवार, 5 अगस्त 2021

डर जाने के बाद...



टुकड़े ही उठाएंगे बिखर जाने के बाद।

घर दिखाई देता है उतर जाने के बाद।

पाएंगे सौगात जी कफन में लपेट कर,

बे-वजूद हो जाएंगे डर जाने के बाद ।

बाद रुख़्सती के कौन रोता है उम्र भर,

रोते कुछ देर तक ख़बर आने के बाद।

बे-जुबान शहर,तन्हा बोलता रह गया,

इमदाद आयी भी तो मर जाने के बाद।

उदय वीर सिंह।

बुधवार, 4 अगस्त 2021

दरबारों के शान शौक ...

 


दरबारों की शान शौक दरबारी लिखते हैं सौदे का सामान प्रीत व्यापारी लिखते हैं जीवन हर पल समिधा यज्ञ सृजन की , याचन की वृत्ति भीख भिखारी लिखते हैं - उदय वीर सिंह

सोमवार, 2 अगस्त 2021

मेरा शहर मुझसे अनजान हो गया है...

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ये शहर मेरा मुझसेअनजान हो गया है।
एक भरोषा था कहीं गुमनाम हो गया है।
पगडंडियां ही सही दिल को जोड़ती थीं,
अब बे-मोड़ हाईवे का निर्मान हो गया है।
सदाआयी पड़ोसी की मोहल्ला सजग हुआ
अख़बारी खबर का अब इंतजाम हो गया है।
शुक्र है हम चले कुछ तरक्की की राह पर
ईमान बाजार का सस्ता सामान हो गया है।
उदय वीर सिंह।

शनिवार, 31 जुलाई 2021

प्रवक्ता आप हो गए...

 

बंद कर मेरी जुबान,मेरे प्रवक्ता आप हो गए।
मैं घर का मुखिया था,और सत्ता आप हो गए।
मुंसिफ सुनना चाहता था मेरी आप बीती,
मैं सुनाता दर्द कि मेरे अधिवक्ता आप हो गए।
कोई रोये भी तो आप से पूछ वरनाअपराध
मैं चेतन से जड़ हुआ,विधि-वेत्ता आप हो गए।
भूख बलात्कार माबलिंचिंग,पीड़त आपका शत्रु
वीजेता पक्ष का हरावल दस्ता आप हो गए।
उदय वीर सिंह।

गुरुवार, 29 जुलाई 2021

आवाज तन्हां आपकी...

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कहकशाँ में रह गयी आवाज़ तन्हां आपकी ।
बुलंदियों की दौड़ में परवाज़ तन्हा आपकी।
देखा नहीं उनकी तरफ जो मुंतजिर थे आपके,
मुंतजिर हैं आप,कितनी आंख तन्हा आपकी।
हवा चली तूफान होकर बस्तियां बर्बाद हैं,
आपका भी घर उड़ा हर बात तन्हा आपकी।
घर छोड़कर शामिल हुए भीड़ की आगोश में,
दी भीड़ ने पत्थरों की सौगात तन्हां आपकी।
उदय वीर सिंह ।

रविवार, 25 जुलाई 2021

दीद भी लिखा होगा...


लिखा है 
बद्द-नसीब तो खुश-नसीब भी लिखा होगा।

वो ख़ुदा है आज गर्दीशी तो कल ईद भी लिखा होगा।

कब तलक खेलेगी सूरत मंजिल की लुका-छिपी,

हो भले ही हजार पर्दों में,कल दीद भी लिखा होगा।

कौन कहता है वरक हर्फों सियाही बदलेंगे नहीं,

आज लिखा है मुश्किल तो कल मुफ़ीद भी लिखा होगा।

उदय वीर सिंह।

रविवार, 20 जून 2021

सज़ा जमाने भर की...



गुनाह था रोने का सजा जमाने भर की।

रोटी ख़्वाब में पाया था वो खाने भर की।

कहा हसरतों कोअपना समझकर दौर से,

मयस्सर न हुई जमीं सिर छुपाने भर की।

हकपसंदों की सतर में वो जैसे खड़ा हुआ,

कट गई गर्दन वीर, देर थी उठाने भर की।

वो दौरे यतिमी में रहा दूर दरबार से रहकर,

खुली नसीब देरथी कीमत चुकाने भर की।

बिखर गई कई टुकड़ों में हद समेटी हुई,

सिर्फ़ देर थी दर से मैयत उठाने भर की।

उदय वीर सिंह ।

तेरे ग़म में बराबर ...

मैं कहूँ न कहूँ अपने ग़म साथिया,
तेरे ग़म में बराबर का हकदार हूँ।
किसने लिखा हमको मालूम नहीं,
कहानी का मैं भी एक किरदार हूँ।
हो रहे कत्ल को देखता रह गया,
उस मंजर का मैं भी गुनाहगार हूँ।
न उठेगी नज़र न लिखेगी कलम,
कैसे कह दूं वफ़ा से वफ़ादार हूँ।
उदय वीर सिंह ।


रविवार, 13 जून 2021

मदिरालय की पौड़ी...


मदिरालय की पौड़ी तेरी पीड़ा कौन पढ़ेगा।
शिला खड़ी औजार नहीं मूर्ति कौन गढ़ेगा।
बंद पड़े दरवाजों से फ़रियाद लगाने वाले,
संवेदन विस्थापित है वेदन कौन सुनेगा।
भरा नीर ग्रंथालय में,कहते नयन केआंसू ,
लाचारी में स्वर-व्यंजन चिन्तन कौन लिखेगा।
तक्षशिला नालंदा की ईंट गयीं स्मृतियों से,
आत्म-मुग्धता त्याग,सत-पथ कौन वरेगा।
उदय वीर सिंह ।

ताज पैरहन है सेवादारी का..


आज जो कहा है आपने ,कल आपको सुनना होगा।
बुलंदी ही कुछ ऐसी है,नीचे आसमान के रहना होगा।
सवाल आज भी वही हैं जो कल पूछा था आपने,
अंधेरा है तो हर हाल में चिराग़ों को जलना होगा।
तूफान की भी उम्र लिखी है उसके उठने से पहले,
शमशान गवाह है,जलाने वाले को भी जलना होगा।
जुल्म-ए-तख्त की हिमायत जत्थेदार नहीं करते,
ताज पैरहन है सेवादारी का,सेवादार बनना होगा।
उदय वीर सिंह ।