शनिवार, 13 अगस्त 2022

सहारा मिलता.......




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काश! सच को जरा सहारा मिलता।

मुल्जिम को जीवन दुबारा मिलता।

न बेचते हम अपना जमीरो ईमान,

तुमको तुम्हारा हमको हमारा मिलता।

न देते हम नफरत के पैगामों को हवा,

तूफान में किश्ति को किनारा मिलता।

झूठ के पांवों को गर पंख नहीं मिलते,

जमाने को पसंदीदा शोख शरारा मिलता।

इंसान को इंसानियत की आंखें मिलतीं,

न होती ऊंच नींच की खाई न बंटवारा होता।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 9 अगस्त 2022

खरांस चली गई....

जब से छोड़ा उनके गीत गले की

खरी खरांस चली गयी।

जब से छोड़ा उनकी लीक 

जीवन की लगी फांस चली गयी।

बन समिधा दे आहुति कुंडों में 

अनुवंधों की, 

भय संशय दुविधा की छाई रात

अमावस ख़ास चली गयी।

कब तक धोते आंसू से मुख, 

कब तक प्यास बुझाते,

तोड़े पत्थर के झुरमुट पा मीठे 

सोते सरित तालाश चली गयी।

पाखंडों के जेवर से जीवन

कितना भारी था,

मैने छोड़ा दरबारी गर्दभ राग,

वो गीत उदास चली गयी।

उदय वीर सिंह ।

9।8।22

बुधवार, 3 अगस्त 2022

अमृत पीकर क्या करेंगे...


 





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अर्थ मर जायेंगे तो शब्द जीकर क्या करेंगे।

न रहेगी दुनियां तो अमृत पीकर क्या करेंगे।

जब बारिश  तेजाबी , हवा में मिर्च घुली हो,

दर्द  के  शहर  में जख्म सीकर  क्या करेंगे।

ईश्वर होजाने का यकीन हो जाये आदमी को

उसे आदमियत की नजीर देकर क्या करेंगे।

उदय वीर सिंह।

रविवार, 31 जुलाई 2022

तूफान से मिलकर देखिए...


 





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कितना सच  सा  लगने लगता है झूठ,
कभी  बे- ईमान  से  मिलकर  देखिए।
किसी दरबारी के सामने बौना लगता है,
कभी किसी  तूफान से मिलकर देखिए।
ईश्वर को ढूंढना न पड़ेगा कभी दर-बदर,
किसी पाखंडी से जुबान लड़ाकर देखिए।
भूख  गरीबी  दहशत  फ़रेब गुमशुदा हुए,
दूरबीन लिए सितारों से मिलकर देखिए।
कितनी रंगत है बुतों की ऊंची फसीलों की,
बदरंग हो गया है इंसान से मिलकर देखिये।
इफरात पानी है लहराता हुआ मरुस्थल में
कभी किसी मृग-छौने से मिलकर देखिए।
उदय वीर सिंह।

शनिवार, 30 जुलाई 2022

मेजबान तो बहुत थे..


 





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भूखा-प्यासा ही रह गया इंतजाम तो बहुत थे।

मिलीन पनाह धूप-बारिश में मकान तो बहुत थे।

रिहा हुआ आखिर बेगुनाह अपनी मौत के बाद,

जींद बीती शलाखों के पीछे विद्वान तो बहुत थे।

रोता रहा इंसान रोटी कपड़ा मकान के जानिब

मंदिरों में हिन्दू मसीतों में मुसलमान तो बहुत थे

गुलामी,भूख का इतिहास अतिश्योक्ति तो नहीं

चौकमें गबरू जवान खेतोंमें किसान तो बहुतथे।

गुमनामियों की ही चादर  में मायूस लौट आया
अजीजों की महफ़िल  में  मेजबान तो बहुत थे

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

पीर लोरी सुनाने नहीं आयी,..








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शमशीर  नींद  से  जगाने  नहीं आयी।

तीर कभी कमान से लुभाने नहीं आयी।

आयी तो बे-मुरौअत अकेने नहीं आयी,

पीर  किसी को लोरी सुनाने नहीं आई।

मन को रौंदती रही गुरबति की जूतियां,

जंजीर तन को  मुक्त कराने नहीं आयी।

दूरियां  मज़बूरियाँ, दहशत  कायम रहे,

प्राचीर  दर  बराबरी निभाने नहीं आयी।

उदय वीर सिंह ।

सोमवार, 25 जुलाई 2022

पत्तों की मुखबिरी


 




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पत्तों की  मुखबिरी  से माली भी डर रहा है।

दरबारियों की फ़ितरत सवाली भी डर रहा है।
जमाने से दर -बदर वो  इंसाफ  मांगता है,
पाए तो पाए कैसे हाथ खाली जो डर रहा है।
इन हवाओं का क्या भरोषा बहने लगें किधर,
उनके  तेजाबीपन  से मवाली भी डर रहा है।
कीचड़ भरी हैं सड़कें रकीबों से  भरे दयार
बेहूरमतों की दहशत जलाली भी डर रहा है।
उदय वीर सिंह

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

मुगालते में था...







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तेरी ख़ामोशियों के पीछे कौन है मुगालते में था।

इल्मो हुनर शराफत,वफ़ादारी मुगालते में था।

शीशे की दीवारों का बे-तरह टूट बिखरा मंजर,

भीड़,पत्थरों की कवायद होगी मुगालते में था।

रिश्तों  का  टूट  जाना  उनका बेसुरा हो जाना,

तलाक की वज़ह तवायफ़ होगी मुगालते में था।

उदय वीर सिंह।

रविवार, 10 जुलाई 2022

कहूँ तो कैसे..





 ....कहूँ तो कैसे..✍️

है साजिशों  की  सान  सम्मान  कहूँ

तो कैसे।

जब  पीना  विष  का  जाम आसान 

कहूं तो कैसे।

दर्द गरीबी ऋण रोग आभूषण सतर 

बनाते बखरी,

याचन जिनकी नियति बनी अपमान 

कहूँ  तो कैसे।

तन, मन, वंधक  जिनका  उपयोग 

पराए हाथों में,

यकृत हृदय कलेजा बिकता सामान 

कहूँ तो कैसे।

होंठ खुले तो विष तीर अनेकों भर 

जाएंगे आनन,

भूख यतिमी अनजानापन उनकी 

पहचान कहूँ तो कैसे।

आदर्शों की प्राण वायु दे जाती है

स्वांस श्लेष 

हैं बिन रोटी कपड़ा और मकान 

उनका हिंदुस्तान कहूँ तो कैसे।

उदय वीर सिंह।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

इश्तिहार दे गया


 




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सुलझे हुए शहर में कोई  इश्तिहार दे गया।
थी  प्यार की  जरूरत वो हथियार दे गया।
उधड़ी हुई कमीज संग उलझा हुआ रफूगर,
टाँकने थे बटन कमीज के तलवार दे गया।
इस छोर से उस छोर तक बहती रहीं बेफिक्र
हवाओं  को  रोकने को कई दीवार दे गया।
ताजी ख़बसर में क्या है शरगोशियाँ लबों पे
बिखरे पड़े हैं दर-दर बासी अखबार दे गया।
उदय वीर सिंह।
7।7।22