मंगलवार, 23 नवंबर 2021

दिल में लिखी है अजमत....









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छीना नहीं बख्सा है रब ने स्वीकार करते हैं।

रब का नूर आला है वो सबसे प्यार करते हैं।

रोक देती है चलने से पहले शमशीर खुद को,

जब हकपसंदों पर जबर ज़ालिम वार करते हैं।

दूध और खून की रोटी बयां करती हैं फ़ासले,

बेचते नहीं बचाकर वतन पर निसार करते हैं।

कपड़ों पर नहीं दिल में लिखी है अज़मत,

मकबूलियत है सच्चे सौदेका व्यापार करते हैं।

उदय वीर सिंह।

7 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

लाजवाब

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा बुधवार (24 -11-2021 ) को 'मुखौटा पहनकर बैठे हैं, ढोंगी आज आसन पर' (चर्चा अंक 4258 ) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। रात्रि 12:01 AM के बाद प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

#रवीन्द्र_सिंह_यादव

Pammi singh'tripti' ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 24 नवंबर 2021 को लिंक की जाएगी ....

http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
!

Jigyasa Singh ने कहा…

सुंदर सराहनीय सृजन ।

Jigyasa Singh ने कहा…

सटीक,बात कहता सराहनीय सृजन ।मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है 🙏💐

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

सुन्दर रचना

Manisha Goswami ने कहा…

बहुत ही शानदार रचना
दूध और खून की रोटी बयां करती हैं फ़ासले,
बेचते नहीं बचाकर वतन पर निसार करते हैं।
एकदम सही बात कही आपने आदरणीय🙏