रविवार, 1 अप्रैल 2012

प्रमाद

पेड़ों की झुरमुटों में 
अंशुमान को स्थिर 
 रखने का प्रयाण,
चन्द्रिका को मुंडेर पर 
खड़ी रखने की जिद ,
पंखुड़ियों के लिबास में 
सिमटी रहने को
कली की विवशता ,
पुरवाई का पश्चिम से निषेध,
पथ से पथिक का अखंडित 
सानिध्य ,
स्वप्नों  का ताज,
तन्द्रा टूटने  के बाद 
कायम रखने का मोह /
हिमगिरी से फूटी धार,
वापस लाने का द्रोह,
अश्रुओं को  चक्षुओं में 
आत्मा को वन्धनों में 
मोती को  सीपियों में ,
प्रज्ञा को रीतियों  में ,
बंधन के प्रयत्न ,
संवरते नहीं 
सिमट जाते हैं 
बिखर जाते हैं ......./



                                   उदय  वीर सिंह 


                           

16 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

परिस्थितियों को बाँधने का भ्रम..

रचना दीक्षित ने कहा…

पेड़ों की झुरमुटों में
अंशुमान को स्थिर
रखने का प्रयाण,
चन्द्रिका को मुंडेर पर
खड़ी रखने की जिद ,
पंखुड़ियों के लिबास में
सिमटी रहने को
कली की विवशता ,

कविता में प्रयुक्त बिम्बों ने कविता को भी जीवंत कर दिया है. बहुत सुंदर प्रस्तुति उदय जी. बधाई स्वीकारें.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
आपकी यह प्रविष्टि कल दिनांक 2-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ

expression ने कहा…

कभी कभी बंधन ही बिखराव का कारण बनते है...

बहुत सुन्दर ...

सादर.

रविकर ने कहा…

श्री रामनवमी की शुभ कामनाएं ।

आपके ब्लॉग पर आकर मन तृप्त हो जाता है ।।

Amrita Tanmay ने कहा…

अति सुन्दर , प्रवाहमयी रचना..

मनोज कुमार ने कहा…

इस बिखराव को समेतना ज़रूरी है।

Rajesh Kumari ने कहा…

kavita me sundar bimbon ka prayog sundar shabd chayan kavita ki saarthakta darsha rahe hain kavita ka mool tathya , ki paristhitiyn ko vaastvikta se modne ki kosish karne se nirasha hi utpann hogi atah jo prakartik hai use yun hi chalne do aur sukh ke sanidhya me raho.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

पर अर्थ नहीं खोते

संध्या शर्मा ने कहा…

अश्रुओं को चक्षुओं में
आत्मा को वन्धनों में
मोती को सीपियों में ,
प्रज्ञा को रीतियों में ,
बंधन के प्रयत्न ,
संवरते नहीं सिमट जाते हैं बिखर जाते हैं ...
प्रयास सफलता का भ्रम पैदा करते हैं लेकिन सफलता मिलती नहीं... गहन भाव... आभार

Maheshwari kaneri ने कहा…

सुन्दर प्रभावमयी उत्कृष्ट अभिव्यक्ति..बधाई उदय जी...

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

yaad aa gaya bachpan me sukhi ret me khel khelna....kaise nanhe hantho se fisal fisal jaatit the ret...lekin ham koshis karte the..bahut hee acchi sahityik rachna padhne ko milti hai aapke blog par..apki hindi par pakad bhee jabardast hai..sadar badhayee ke sath

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

yaad aa gaya bachpan me sukhi ret me khel khelna....kaise nanhe hantho se fisal fisal jaatit the ret...lekin ham koshis karte the..bahut hee acchi sahityik rachna padhne ko milti hai aapke blog par..apki hindi par pakad bhee jabardast hai..sadar badhayee ke sath

कविता विकास ने कहा…

उदय वीर सिंह जी ,अपने मित्रों को अपनी नयी रचनाओं के सन्दर्भ में बताना या उनके प्रकाशन सम्बन्धी सूचना देना आत्म- मुग्धता नहीं कहलाता है ।अगर आप ऐसा समझते हैं तो फिर ब्लॉग की दुनिया ही मिट जाएगी ,आप भी तो आखिर वही कर रहे हैं ।

कविता विकास ने कहा…

उदय वीर सिंह जी ,अपने मित्रों को अपनी नयी रचनाओं के सन्दर्भ में बताना या उनके प्रकाशन सम्बन्धी सूचना देना आत्म- मुग्धता नहीं कहलाता है ।अगर आप ऐसा समझते हैं तो फिर ब्लॉग की दुनिया ही मिट जाएगी ,आप भी तो आखिर वही कर रहे हैं ।

udaya veer singh ने कहा…

आपकी टिपण्णी व डाक दोनों मिले ,अच्छा लगा ख़ुशी है तुलनात्मक अध्यवसाय के सोपानों पर चढ़ने का सलीका आ गया / हम माफ़ी चाहेंगे अपठनीय कथ्य को आत्मसात न कर पाने पर.....