मंगलवार, 4 जून 2019

मेरी मास्को यात्रा .. [7 जून 19 ]


मेरी मास्को यात्रा -7/6/19
 विश्व हिंदी साहित्य परिषद् का साहित्यिक रश्मि आलोक हिंदी भाषा को उच्चतम आकाश देने का अप्रतिम निश्छल प्रयास निश्चय ही उच्चतम मानदंड स्थापित करता हुआ प्रशंसनीय है ।सशक्त वैश्विक हिंदी ,साहित्य जगत का अंशुमान बने मेरी कामना है  
  मेरी साहित्यिक यात्रा के सोपानों में मेरी मास्को यात्रा अविस्मरणीय होगी मेरी नयी पुस्तक ' साक्ष्य ' [ कहानी संग्रह ] का विमोचन मेरी गौरवमयी सम्मेलन में प्रतिभागिता ,मुझे मेरी साहित्य साधना में निरन्तर बल प्रदान करेंगे  मेरे मूर्धन्य हिंदी सेवी वरिष्ठों कनिष्ठ विद्वत जनों ,मनीषियों का सानिध्य मुझे अह्वालादित करता है  
मेरी साहित्यिक यात्रा के तमाम सोपान मेरे स्नेही सुधिजनों की आत्मीयता आशीष की स्नेहिल सौगात है जो मेरे हृदय में संचित है  
  आभार प्रकट करता हूँ अपने गुरुग्रथ साहिब जी का ,सुधि पाठकों ,गुरुशिक्षकों स्वजनों के अमूल्य स्नेह का जिसका प्रतिदान मैं देने योग्य नहीं ,सिवा शीश झुका उनके वंदन के ..... 
उदय वीर सिंह 
3/6 /19

सोमवार, 3 जून 2019

हर दिल में आग मत ढूढो-


कायम रहने दो जिंदगी को 
हर दिल में आग मत ढूढो-
हर डाली फूलो सुगंध की नहीं 
हर बिरवे में पराग मत ढूंढो-

अपनी आँखों पर भरोषा चाहिए 
हर अँधेरे में चिराग मत ढूंढो -
रौनके इल्हाम कम नहीं दुनियां में 
वीर, प्रेम में वैराग्य मत ढूंढो

सहरा होता ही है धूप की सल्तनत 
चल सको तो चलो बाग़ मत ढूंढो
नकाब नहीं इल्म पहनो नूर वालो 
ख़िताबों के बीच खिताब मत ढूंढो-

उदय वीर सिंह



शुक्रवार, 31 मई 2019

ज़माना चाहता है -


जमाना चाहता है फ़क़ीर हुआ करे
हर गली चौबारे में कबीर हुआ करे-
इल्म्दा हो जाये हर आँख की पुतली
ईमान पर मिटने को जमीर हुआ करे -
गुलशन और गुलों की सरकार मांगिये
गुलों की गर्दिशी में दस्त शमशीर हुआ करे -
उदय वीर सिंह

सोमवार, 27 मई 2019

देशी हो गयी बेगानी परदेशी के लिए ....



 हमने ढोए दर्द लाखों परदेशी के लिए

देशी हो गयी बेगानी अंग्रेजी के लिए -
अपनी धरती अपना आँगन अपने चाँद सितारे
अपनी संस्कृति अपना वैभव हैं कैसे दूर बिसारे -
हम करते बेईमानी अंग्रेजी के लिए -
राग हैं अनुपम अद्दभुत रस हैं अलंकार की आभा
तन मन में हिंदी की रसना मधु-भाव पूर्ण मर्यादा -
क्यों कलम बनी प्रतिहारी अंगरेजी के लिए -
उंच नीच से ज्यादा अंतर परदेशी ने कर डाला
भाषा अपनी रही कलपती ले राष्ट्र-प्रेम की माला-
होई अपने घर अनजानी अंगरेजी केलिए -
उदय वीर सिंह






रविवार, 26 मई 2019

मर्यादा हित पगड़ी .....


सिक्खों ने मजलूमों और मर्यादा हित पगड़ी निसारी है ,
नमन उस शिक्षिका को रक्षार्थ शिष्य अपनी सारी उतारी है -
जंग लग गयी शमशीर में जिसने सिर्फ झूठी शान में ढोई ,
मर्यादा मानव धर्म की सेवा हमारी तेग अहर्निश उघारी है -
निरीह निर्बल बेकसों की लाश पर हो जब सल्तनत कायम
तब सिक्खी ढाल बनती है ,भले मिटती हस्ती हमारी है -
उदय वीर सिंह


अपना पैर होना चाहिए .....


हर हाल में चलने को अपना पैर होना चाहिए -
अगर गंतव्य पाना है, आलोचक गैर होना चाहिए -
अपमान के गांवों में सम्मान ढूढो,
संस्कार कहते हैं लबों पर खैर होना चाहिए -
अहसान करना जी कभी सन्दर्भ लेना,
नफा नुकसान से दूरी,मनस निरवैर होना चाहिए -
-उदय वीर सिंह

शनिवार, 25 मई 2019

मद की कंध गिरानी होती है ....


किसी धर्म -पंथ से दूर बहुत,राष्ट्र-राग गानी होती है,
अमरत्व मोक्ष से दूर बहुत,राष्ट्र की अलख जगानी होती है-
जब जब धर्म की स्याही से राष्ट्र-प्रलेख लिखे जाते,
दीन- दासता की सदियों तक पीर चुकानी होती है -
छल षडयंत्र पक्षपात मोह से वैर सदा रखना होता,
समतल पथ सम की रचना मद की कंध गिरानी होती है -
उदय वीर सिंह



शनिवार, 18 मई 2019

जब समय अंत का .....


जब समय अंत का आता है,
याद बहुत कुछ आता है ,
चाहत समेटने की कुछ बहुत बहुत ,
पर पवन वेग उड़ा ले जाता है -
क्या खोया क्या पाया ,
निर्जन पीछे सूनापन आगे 
स्वप्न धुल धूसरित हो जाता है -
स्वप्निल गट्ठर लाद पीठ 
हो आत्ममुग्ध कर कागज के फूल 
मकरंद कहीं खो जाता है -
स्वजन पूछते कहाँ रहे 
वांछित कौन अधूरी अभिलाषा ?
नेह सनेह सम्बन्ध विखंडित 
मृग मरीचिका में दह जाता है -
कन्धों का बोझ ढोना होता है
देना प्रतिकार अनादर है ,
दोनों तट दो आँचल विस्मृत 
बाँहों का सेतु ढह जाता है -
औषधि बनकर रहना था 
मन अवसाद पूरित रह जाता है -
उदय वीर सिंह




मैं अकिंचन ....



मैं अकिंचन.....
मैं अकिंचन अक्षरहीन
नयनन की भाषा लिखना
चाह विमर्श की होती है
प्रियतम की गाथा लिखना 
सरल हृदय का भाषी हूँ ,
भाव सरल भाषा लिखना ... ।
भाव समन्वय की गतिशील रहे
अविरल प्रवाह गति मंथर मंथर
संवाद मौन की गगन दुंदुभि
नाविक प्रयाण पथ सदा निरंतर -
स्वर प्रकोष्ठ के नाद करें
जाग्रत अनंत जिज्ञाषा लिखना -
स्पर्श मलय का अभिनंदन
होने का प्रतिपादन कर दे
यत्र तत्र बिखरे शुभ परिमल
एक बांध सूत्र सम्पादन कर दे -
बाँच सके निर्मल मन मेरा
भाष्य नवल परिभाषा लिखना ......... ।
पुण्य प्रसून आरत यश भव की
स्नेहमयी आशा लिखना .....
सरल हृदय का भाषी हूँ ,
भाव सरल भाषा लिखना ... ।
उदयवीर सिंह

बुधवार, 15 मई 2019

उद्दात भाव नभ चढ़े मंजरी ....


काव्य -प्रभा में बांची गयी मेरी एक रचना --
हाथों में हथियार नहीं
हाथों को औजार मिले
हाथों की मुट्ठी भिंची हो
हाथों को कारोबार मिले -
आँखों को आंसू क्षार नहीं
खुशियों की रसधार मिले
सौगात मिले जब आँखों को
ह्रदय हुलसता प्यार मिले -
पांवों के निचे बारूद नहीं
पुष्ट समतल आधार मिले
पांवों की दशा दिशा निश्चित
हँसता गंतव्य का द्वार मिले -
जिह्वा पर दर्प के शब्द नहीं
अमृत भावों का सार मिले
हृहय जोड़ते अनुवंध मिलें
सच्चे सौदों का व्यापार मिले -
मानस में विध्वंश का भाव नहीं
सृजन मिले सहकार मिले
उद्दात भाव से खिले मंजरी
मधु पुष्पों का संसार मिले -
उदय वीर सिंह