मंगलवार, 17 जुलाई 2018

फिर भी जीवन में प्यार बहुत हैं -


रार बहुत तकरार बहुत हैं
फिर भी जीवन में प्यार बहुत है -
खुशियों का एक नीड़ बना
कहने को घर-बार बहुत है-
कितना सूना छत छाजन बिन
जीवन में दीवार बहुत हैं -
प्यार की पाती दिल ही बांचे
छपने को अखबार बहुत हैं -
औजारों की बात निराली
वैसे तो हथियार बहुत हैं -
मिल जाए जीवन को गौरव
कहने को अधिकार बहुत हैं -
सच्चा सौदा नानक करते
करने को व्यापार बहुत हैं
एक दाता है देने वाला
कहने को दरबार बहुत हैं -
उदय वीर सिंह


रविवार, 15 जुलाई 2018

क्या रह जाएगा देश...

क्या रह जाएगा ये देश 
हिन्दू मुसलमान होकर 
दरख़्त परिंदे भी रह जाएँगे 
क्या धर्म की पहचान होकर -
चूल्हे की आग भी बखरी 
तीज त्यौहार कुफ्र हो जायेंगे 
किताबें दुश्मनी का चश्म 
या रहेंगी नफरती मकान होकर -
भूल गए हैं मजहब अपना 
ये मजहबी लम्बरदार 
शायद इनको पसंद नहीं 
रहना एक इंसान होकर -
क्या एक इश्वर काफी नहीं 
सृजन और संहार के लिए 
क्यों ब्रह्माण्ड हथियाना चाहे 
आखिर एक मेहमान होकर -
दर्द का कोई धर्म है तो बता 
बता है कोई प्रेम की जाति 
नफ़रत का कोई रंग नहीं 
क्यों जीना बदगुमान होकर -
कभी परिंदों को तरुवर ने 
आश्रय से इनकार किया 
या फूलों ने धर्म पूछकर 
इत्रों का व्यापार किया -
प्राण वायु क्या धर्म पूछ कर 
शहर गाँव घर बहती है
पंथ पूछ कर निर्मल नदियाँ 
तृप्त जीवन को करती हैं -
प्रीत अमन के बाग़ संवारें 
कालजयी बागवान होकर -
उदय वीर सिंह



गुरुवार, 12 जुलाई 2018

सामाँन नहीं बन पाया हूँ


इंसानों की बस्ती में रह
इंसान नहीं बन पाया हूँ
बिकने खातीर मोल हाट
सामान नहीं बन पाया हूँ
जीवन की खुशियों का
पनघट पीकर मरुधर सोया
जीवन को जीवन दे पाँऊ
नखलिस्तान नहीं बन पाया हूँ -
सुखी आँखों से ख्वाब गए
आरत मन अकुलाता है
टूटे दिल की पीर बहुत
अरमान नहीं बन पाया हूँ -
उदय् वीर सिंह





रविवार, 1 जुलाई 2018

खोना जानता है ...


साधनों की सेज सोना चाहता है
वेदना के नाम रोना जानता है
धुप की चादर मिली क्या
कुंद मानस हो गया
क्षितिज पर बृक्ष का संहार
नभ में छाँव बोना चाहता है -
तमस में दीप का उपक्रम नहीं
खोजता है पथ सुघर
परायी कंध पर रख बोझ अपना
बोझ ढोना चाहता है -
बेचकर गंतव्य पथ
पग महावर साज ली
क्रंदन कृपा की ओट ले
गंतव्य पाना चाहता है -
उदय वीर सिंह



शनिवार, 30 जून 2018

सुहाग तो सुहाग होता है -


उसे नफ़रत सिर्फ अन्धेरों से है 
जलता है तो बेहिसाब जलता है 
देखता है दर दयार फिरका 
रोशन चिराग तो चिराग होता है -
लाख बंदिशों में भी जुदा नहीं 
काँटों की सेज पर भी हुनरमंद 
समझा लेता है सुनी आँखों को 
वीर ख्वाब तो ख्वाब होता है -
लगा देते हैं दामन में फितरती 
ता-उम्र बे-जार रोने के लिए 
कुछ लग जाते हैं शौको शान में 
बेशक दाग तो दाग होता है -
किसी मांग में सिंदूर का होना 
बेख़ौफ़ बयां करता है हनक माही की 
बदले खुदाई भी बहुत फीकी है 
वीर सुहाग तो सुहाग होता है -
गमलों में बरगद भी उगने लगे 
बेल अमलतास नागफनी गुलाब 
यहाँ परिंदों के घर झूले नहीं बनते 
एक बाग़ तो बाग़ होता है -
उदय वीर सिंह



रविवार, 24 जून 2018

आप के इंतजार में ख्वाब ...

आप के इंतजार में ख्वाब बैठे हैं
वो कह रहे थे हम जाग बैठे हैं -
बिछी है मगहर में कमली उनकी
आप काशी काबा प्रयाग बैठे हैं -
आसमां एक जमीं मिली कमोबेस सबको
आप हैं की ले नया राग बैठे हैं -
कोयल की मांग थी जमाने को
कंगूरो बाग में अब काग बैठे हैं -
ग्रंथ कहते हैं मानवता से बड़ा कोई
ये सूत्र वाक्य भी त्याग बैठे हैं
सहेज रखता है पन्नो को माजी
गौर से देखिए कितने दाग बैठे हैं -
आस्तीन में न्याय प्रेम रखिए
टटोल कर देखिए नाग बैठे हैं
भरोषा रखिए मीरीऔर पीरी का
गुरुज्ञान के तमस में चिराग बैठे हैं -
उदय वीर सिंह

रविवार, 17 जून 2018

शहीदी पर्व गुरु अर्जन देव जी महाराज

शहीदी पर्व - [वलिदान मेरा संस्कार है ... धर्म मेरा प्यार है ]
विनम्र श्रद्धांजलि ...... !
अमर शहीद पंचम गुरु, गुरु अर्जन देवजी महाराज !
॥जपियों जिन अर्जन देव गुरु ॥संकट योनि गरभ न आयो ॥ वाणी 
 सिक्ख धर्म के पंचम गुरु अर्जन देव जी महाराज [जन्म 15 अप्रैल 1553 गोबिंदवाल साहिब पंजाब । वलिदान दिवस 16 जून 1606 डेरा साहिब लाहौर पाकिस्तान ] माँ भानी जी व पिता गुरु रामदास जी महाराज के आँगन अवतरण। 
 मुग़ल बादशाह जहाँगीर के शासन काल में इस्लाम कबूल न करने,भारतीय संस्कृति संस्कारों की आवाज बुलंद करने भारतीयता की जड़ों को मजबूती व सिंचन के आरोप में मृत्यु के दुर्लभतम यातना के अमानवीय तरीकों द्वारा गुरु महाराज को मृत्युदंड दिया गया । फिर भी वे अपने संकल्प विचार संस्कार संस्कृति को लेस मात्र भी धूमिल नहीं होने दिए, असह्य कष्टो तसीहों आरोपों से विचलित नहीं हुए,अटल रहे अपने अनुयायियों के अटल प्रेरणा स्रोत बने रहे।
उनके शहादत दिवस पर अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनकी विरासत के सच्चे वारिस बन सकें अरदास करते हैं ।
उदय वीर सिंह

शनिवार, 16 जून 2018

इंतजार में ख्वाब बैठे हैं ....

आप के इंतजार में ख्वाब बैठे हैं
वो कह रहे थे हम जाग बैठे हैं -
बिछी है मगहर में कमली उनकी
आप काशी काबा प्रयाग बैठे हैं -
आसमां एक जमीं मिली कमोबेस सबको
आप हैं की ले नया राग बैठे हैं -
कोयल की मांग थी जमाने को
कंगूरो बाग में अब काग बैठे हैं -
ग्रंथ कहते हैं मानवता से बड़ा कोई
ये सूत्र वाक्य भी त्याग बैठे हैं
सहेज रखता है पन्नो को माजी
गौर से देखिए कितने दाग बैठे हैं -
आस्तीन में न्याय प्रेम रखिए
टटोल कर देखिए नाग बैठे हैं
भरोषा रखिए मीरीऔर पीरी का
गुरुज्ञान के तमस में चिराग बैठे हैं -
उदय वीर सिंह


शनिवार, 9 जून 2018

पाँवों मेंजंजीरें थीं

गंतव्य मेरे मानस मन में
रुँध पाँवों में जंजीरें थीं
हाथ हमारे कलम हमारी
हर तरफ तनी शमशीरें थीं -
स्तब्ध था मैं प्रारव्ध देख
निज हस्त प्रबल लकीरें थीं -
पुण्य प्रसून मोद की आशा
स्वागत कमान और तीरें थीं -
धूल धूसरित पैबंद बसन मम
वहाँ रत्न जड़ित तस्वीरें थीं -
भरे राज सिंहासन तन से
अवशेष प्रचुर सलीबें थीं -
उदय वीर सिंह

गुरुवार, 31 मई 2018

लोकतन्त्र एक सुंदर शब्द ,


एक वो थे लोकतन्त्री  दरवेश 
 एक ये भी लोकतन्त्र के राज रहे 
लोकतन्त्र एक सुंदर शब्द ,
भाव सुंदरतम साज रहे -
संवेदन करुणा सहकार मरे 
समर्थ मनोरथ पाल रहे -
ज्ञानी गुणी गतिशील मनीषी
स्तब्ध निःशब्द अवसाद में हैं
हुए तिरोहित तत्व मनुखी
दैत्य उदण्ड द्वारपाल बने -
लगते ताले मूलभूत अधिकारों पर
प्रलाप प्रलंभ की छाया है
कायर कामी कपटी लोभी
अपनी परिभाषा में ढाल रहे -
गौरव शौर्य यश प्रेम प्रतिष्ठा
विनिमय के पलड़े झूल रहे
जिसकी लाठी भैंस उसी की
नैतिकता कुएं में डाल रहे -
उदय वीर सिंह