रविवार, 19 फ़रवरी 2017

जन्म दिन की अनमोल बधाई प्रिये ॥

मेरे जीवन की डोर ! जन्म दिन की हृदय से मुबारकबाद ! रब ने बख्सा अनमोल को एक बे-मोल को। मैं खुशनसीब हूँ की तेरा साथ है ...रहे जन्मों तक .शुक्रिया !
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जीवन का सफर कहूँ 
या रब की नजर कहूँ - 
मरुधर में एक नदी या 
मरुधर का शजर कहूँ -
तलाश में है आईना
एक रोशनी का दर
इसको खबर कहूँ या
अपनी उमर कहूँ -
सहता रहा थपेड़े
जब भी जहां मिला
तुम्हें शाने जिगर कहूँ
या जंगे जफर कहूँ -
उदय वीर सिंह 

ओढ़ कर बर्फ की चादरें

ओढ़ कर बर्फ की चादरें
गर्मियां तलाशते रहे
जलाकर ख्वाब में दीपक
सर्दियाँ गुजारते रहे -
घाव ऐसे भी न थे की चल न पाएँ
मंज़िलें बुलाते रहे  -
बुज़दिली को बदनसीबी कहा
अपनी कमियाँ छुपाते रहे -
आंसुओं का सैलाब प्यास नहीं बुझाता
और हम आँसू बहाते रहे -

उदय वीर सिंह

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

बधाइयाँ ISRO ! बधाइयाँ भारत !

स्वप्न प्रज्ञा माण की संकल्प की उड़ान है
स्वर्णाक्षरॉ में लिख गया इतिहास की पहचान है
तक्षशिला नालंदा का अंशुमान पुनः उग रहा 
भारत की है बसुंधरा भारत का आसमान है -
दिग दिगंत कह रहे माँ भारती की कोख धन्य
लिख रहा ब्रहमाण्ड भूमि भारत महान है -
उदय वीर सिंह

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

आह वैलेंटाइन ! वाह वैलेंटाइन !

आह वैलेंटाइन ! वाह वैलेंटाइन !
वैलेंटाइन दिवस अपसंस्कृति का प्रतीक लगता है
फरेबी गुजारता है रात नगरबधू संग रईस लगता है
चुभलाता है होठ रात के अँधेरों मे रसीले लगते हैं
दिन के उजालों में नर्क का द्वार घोषित करता है -
उदय वीर सिंह

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

पथ मिले प्रयाण के

पथ मिले प्रयाण के तो पैर कट गए
गंतव्य का प्रकाश छिपा बादलों मेँ है 
अंतहीन वेदना दिशाहीन चेतना हुई
विकल्प भी कहीं बीच दलदलों मेँ हैं -
शिलाओं पर बने निशानअति मौन हैं
भर गए हैं कीच अतिवादिता की धूल से
प्रक्षालनार्थ कौन है सून्यता प्रखर हुई
प्रबोधिनी प्रभा कहीं सोई आँचलों मे है -
उदय वीर सिंह

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

जरूररी नहीं हर वस्तु संगमरमरी हो

गोंद किसी की भी हो भरी हो 
तबीयत किसी की हो हरी हो 
खुशियाँ बाँट लेने में दर्द क्यों 
दर्द किसी का हो आखिरी हो -
किसी के लिए मांग कर मौत 
तुम्हें अमरत्व तो नहीं मिलता 
अरदास होनी चाहिए रब से वीर 
लोड़बंदों की हर हसरत पूरी हो -
काला भी रंग है कुदरत का दिया 
जरूररी नहीं हर वस्तु संगमरमरी हो 

उदय वीर सिंह 

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

कागजी ख़यालों में

आया बसंत सिर्फ कागजी ख़यालों में
उजड़े हैं बाग वन खेत हैं सवालों में -
खोया है पीत रंग लाल सूही मंजरी
चिना है अनंग कहीं जैसे दीवालों में -
काली है बदली संग पानी भी काला है 
मधु रस मदन अब रह गए मिसालों में -
उदय वीर सिंह

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

मुद्दे पीछे हैं

मुद्दे पीछे हैं 
लिप्सा आगे 
उद्देश्य विस्मृत है 
सरोकार अधोगति को 
सहयोग विनिमय की राह 
मनुष्यता घोर शत्रु 
शक्ति अराजक 
भक्ति वीभत्स 
श्रद्धा अछूत 
त्याग तर्पण की वस्तु 
स्नेह दुर्गंध 
धैर्य कायरता 
भीड़ आदर्श 
छल बुद्धिमत्ता 
कदाचार पराक्रम
मानदंड होकर रह गए
न्याय एक अनहोनी घटना 
जैसी है -
उदय वीर सिंह 



शनिवार, 28 जनवरी 2017

तूँ नशे में था -

तू नशे में था 
तेरे घर की आबरू 
नीलाम हो गई -
तू नशे में था 
तेरी ड्योढ़ी बदनाम हो गई -
तू नशे में था 
सुबह में ही शाम हो गई -
तेरी ही नहीं अपनों की मौत
 तेरे नाम हो गई -
तू नशे में था 
संस्कारों की हवेली 
शमशान हो गई -
तू नशे में था 
बहुत पर्दे में थी हया 
सारेआम हो गई -

उदय वीर सिंह 



गुरुवार, 26 जनवरी 2017

खुशियों का आधार भारत

वन्देमातरम ! गणतंत्र दिवस की लख लख बधाई मित्रों !
चहुं ओर हो आजाद भारत
पर सुर्खाब हो आजाद भारत
समवेत स्वर एकल दिशा हो
खुशियों भरा आबाद भारत 
मुक्त हो वेदन व्यथा से
हो शक्ति का सम्राट भारत
विश्व शांति का दूत भारत
हो असमर्थ की आवाज भारत -
आँखों में दृष्टि कोरी सृजन की
प्रेम करुणा का आधार भारत -
उदय वीर सिंह