सोमवार, 24 सितंबर 2018

त्याग दरबारी गायन को

त्याग विलास की अभिलाषा
त्याग दरबारी गायन को
त्याग सुमन के सेज स्वप्न
पी अमरतत्व रसायन को -
घायल घाव अनेक भरे तन
यद्पि तन कृशकाय अबल
आज मृत्यु कल द्वार मुक्ति के
प्राणित कर शापित मन को-
उन्माद नहीं संवाद सृजन के
समतल क्षितिज मर्यादा वांछित
तज वैर रार संहार के शंसय
जनहीत प्रस्तर कर अन्तर्मन को -
तिमिर घोर घन क्षार गगन
चपला षडयंत्री अविरल है
चलना होगा ले दीप भीष्म बन
पीना होगा विष आयन को -
पढ़ कालखंड के साक्ष्य, रचो
तज लोभ मोह पक्ष के दंश दूर
गिरी पयोधि नद जाग्रत हैं
रच नव समीर वातायन को -
उन्माद नहीं संवाद सृजन के
समतल क्षितिज मर्यादा वांछित
तज वैर रार संहार के शंसय
जनहीत प्रस्तर कर अन्तर्मन को -
उदय वीर सिंह

रविवार, 23 सितंबर 2018

लौट, गुजरी बिसरी शताब्दियों को देखता हूँ

लौट, गुजरी बिसरी शताब्दियों को देखता हूँ 
पिछले पायदानों पर ही मौजूदगी है आज तक
इस आजाद भारत की उपलब्धियों को देखता हूँ - 
दरबारी,दलाल कल भी आनंद में थे आज भी हैं 
कालाहांडी भूखी नंगी आवाम व बस्तियों को देखता हूँ -
परिवर्तन हुआ है बेशक दिखता भी है उदय
सत्ता गोरों से कालों की गतिविधियों को देखता हूँ -
शिक्षा सुरक्षा समानता के ग्रंथालय ,ग्रंथी बहुत हुए
आज भी आदिमता की पैरोकारी कुरीतियों को देखता हूँ
उदय वीर सिंह

रविवार, 9 सितंबर 2018

कुदरत एक जैसी है -

मुख्तलिफ रंगों का शहर 
नफ़रत एक जैसी है -
सजा और इनाम के वक्त, 
हुक्मरानों की फितरत एक जैसी है -
छुपा लो बख्तरबंद या तहखानों में 
कुदरत एक जैसी है -
अंधेरो या उजालों की मोहताज नहीं
रब दी रहमत एक जैसी है -
उदय वीर सिंह
[मारीशश सम्मेलन के दौरान मारीशश देश की शिक्षा ,न्याय व समाजिक मंत्री श्रीमती लीला देवी दुखन के साथ कुछ सरोकारी पल ]

रविवार, 2 सितंबर 2018

एक ज्वाला मुखी ही काफी है ...


किसी को देव किसी को
दानव बना दिया है
किसी ने नहीं कहा अपने को
मानव बना लिया है-

अनेकों सोते कम पड़ते है
प्यास बुझाने को
एक ज्वालामुखी ही काफी है
जीवन की रीत मिटाने को -

भरा है आँखों में नीर
हृदयमें ज्वालामुखी क्यों है
नंगी लाश से पूछते हो
क्या अवशेष बताने को -

शोक गीतों में रंग ढूंढने
चले रस अलंकार के गायक
संवेदन के पंख कटे जब
क्या गति मिली उड़ानों को -

नंगे तन में ढूंढ रहा है
कलुषित कर ले कपड़ों को
चित्कारो में विजय प्रमाद
संस्कृति रक्षा रखवारों को -

उदय वीर सिंह





शनिवार, 25 अगस्त 2018

बेटियाँ राष्ट्र संस्कृति की शिक्षिका हैं ....

बालिका गृहों के नाम अपनी गल - बात लिखता हूँ 
मानवीयता की देह पर हैवानियत का आघात लिखता हूँ 
पशु बना इंसान संवेदना मार, अपने जज्बात लिखता हूँ -
बदलेगी सूरत एक दिन बेटियों का नवल प्रभात लिखता हूँ -
ओढ़ कर खोल दया करुणा का , आत्मा नोचने वालों
देकर पनाह जीवन को अंतहीन दर्द बेबसी लाचारी देने वालो
बेटी नारी ही नहीं संस्कृति समाज राष्ट्र को लांछित किया है
अधम नीच नर पिशाचो तेरे आघातों का प्रतिघात लिखता हूँ -
उदय वीर सिंह

रविवार, 12 अगस्त 2018

11वां विश्व हिंदी सम्मेलन [मारीशश ] कई सन्दर्भों का मायिना -

11वां विश्व हिंदी सम्मेलन [मारीशश ] कई सन्दर्भों का मायिना -
हम अपने देश में ही अपनी भाषा की विपन्नता की स्थिति का संज्ञान नहीं लेते एक राष्ट्र भाषा का चिंतन आरम्भ हुआ नहीं की क्षेत्रीय भाषा का रुदन, विलाप स्वर बिरोध आकार ले लेता है , शंसय के बे-मौशम बादल घुमड़ने लगते हैं कि हमारी धार्मिक,जातीय क्षेत्रीय अस्मिता अस्तित्वहीन हो जाएगी हमारा विकास क्रम ही नहीं मूल ही समाप्त हो जाएगा , यह कैसी अभिशप्त सोच है आज भी हमारे गणतंत्र भारत में 1404 बोलियाँ अस्तित्व में हैं अनेकों िलुप्त प्राय हैं ।अर्थतः सम्यक रूप से हम आज भी एक दुसरे की भावनाएं गति, विकास, वेदना खुशियों को समझ नहीं पाए हैं कारन स्पष्ट है सम्प्रेषण संवाद सम्मलेन का नितांत आभाव ,वैचारिकता बिलग रही किसी मायिने में उपेक्षित भी होती रही, कुछ प्रयास हुए भी तो सफल नहीं हुए 
बिभिन्न भाष बोलियों के पुरोधाओं ने अपना परचम लहराया पर निरर्थक स्वाभिमान भ्रम का शिकार हो एकांगी साबित हुआ
दासता की अवधि में एक कुशल नेत्रित्व जो जनमानस को एक मंच पर एक समग्र भाव में एका के प्रबल सन्दर्भों में नियोजित कर सके एक भाषा का होना अनिवार्य तत्व माना गया और इस क्रम में हमारे संत कवियों का अमूल्य योगदान मिला .जिन्होंने ओज और अमृतमयी वाणी का संचार किया जिसने सम्पूर्ण भारत में जनमानस द्वारा शब्दों को बाद में भावों सार्थक अर्थों में पहले अंगीकृत किया गया .... निहसंदेह वह अपभ्रंस ही सही लोक-मान्य भाषा हिंदी थी , जो विशाल हृदय थी धर्म समाज जमातों में संकुचित नहीं सिमित नहीं ,साम असीमित थी
मनीषियों बौद्धिक लम्बरदारों ,राजनेताओं शासकों स्वयं-सेवी संस्थाओं के हिंदी के प्रति सार्थक समर्पित प्रयासों का प्रतिफल है की आज हिंदी भारत ही नहीं वरन सम्पूर्ण विश्व में पहचान की मोहताज नहीं है कहीं भी आप हिंदी बोल कर असुरक्षित नहीं हैं
इस विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन विदेशी भूमि पर होने का निहितार्थ भी सुखद परिणाम फलदायक है ,सम्मलेन के मुख्य विचारणीय कार्य विमर्श विन्दु -
1- वैश्विक हिदी 2- भारतीय संस्कृति ,यथार्थ समीचीन भी अपनी पूर्णता में हैं। इन पर विमर्श ही नहीं कार्यरूप में परिणिति की महती आवश्यकता है
इस सम्मलेन को दो देश भारत मारीशश मिल कर आयोजित कर रहे हैं सम्पूर्ण विश्व से प्रतिनिधि आमंत्रित हैं पधार रहे हैं ,यह सुखद है सौभाग्य है निश्चित ही भारतीय भाषा का वैश्विक - रूप निखरेगा ही नहीं शिखर को प्राप्त होगा हम सम्यक रूपसे भारतीय भाषा हिंदी को वैश्विक हिंदी के रूप में स्थापित देखना चाहते हैं इस क्रम में भारत सरकार ही नहीं,वरन हिंदी सेवियों , स्वयं -सेवी हिंदी संथाओं का भी अमूल्य योगदान प्राप्त है ,निश्चय ही वो साधुवाद  बधाई के पात्र हैं  
एक सार्वभौम राष्ट्र की प्रखर पहचान बिना राष्ट्र भाषा के अधूरी ही होती है ,पूर्णता के लिए भारतीय जनमानस को सहयोग संकल्प त्याग निष्ठां विशाल ह्रदय के साथ समर्पित होना होगा ,बिसंगतियों पूर्वाग्रहों को तिरोहित कर हिंदी अविवादित रूप से राष्ट्र भाषा का स्वरुप पाए सम्मलेन की सफलता की हमारी हार्दिक कामना
उदय वीर सिंह




मंगलवार, 7 अगस्त 2018

मित्रता

मित्रों ! ह्रदय से आभार ...
आपकी मित्रता कमल जैसी है
मरुस्थल में बृक्ष व फल जैसी है
अंधेरों में छोड़ देती है परछाईं 
आपकी मित्रता संबल जैसी है -
मानस में दुर्गन्ध की जगह नहीं
पीत मित्रता पावन संदल जैसी है
प्रतीक्षा नहीं करती पुकार की
सहेज ले नीर आँचल जैसी है -
उदय वीर सिंह

बुधवार, 1 अगस्त 2018

चल बैजयंती कंधे पर ....


ले चल बैजयंती कन्धों पर
अपनी हार देखता हूँ -
जीते नेता हारी जनता
मैं हर-बार देखता हूँ -
नारों में भारत एक आँगन जैसा
आज कई दिवार देखता हूँ -
वादों के झुरमुट वादों के जंगल
वादों का बाजार देखता हूँ -
खाली नींव प्रासाद सपनों का
संगमरमरी शिलान्यास पट
बार बार देखता हूँ -
हरिया आज भी हरिया है
गब्बर आज भी गब्बर हैं
जो हमसफर थे अंग्रेजों के
आज मुल्क के रहबर हैं -
पहने हार सरीखा फांसी का फंदा
अमर शहीदों का प्यार देखता हूँ -
आँखों में आँसू मानस ठगा हुआ
सपनों का व्यापार देखता हूँ -
हाथों ही नहीं कपड़ों में देखा
पुष्प मनोरम सजे हुए
उन हाथों में आज सजी दो धारी
नंगी तलवार देखता हूँ -
रस छंद अलंकार व्याकरण भाषा में
आँखों में झूठा प्यार देखता हूँ -
छोड़ गए मैदान जंग की
धर हाथ में हाथ मुस्काने वाले
जब फतह मिली सिंहासन पर
उनका अधिकार देखता हूँ -
उदय वीर सिंह