सोमवार, 23 जनवरी 2017

गीतों के श्री आँगन में

गीतों के श्री आँगन में प्रेम भी है 
श्रिंगार भी है, वेदन भी है -
स्मृतियों के सुंदरवन स्नेह भी है 
आभार भी है,संवेदन भी है -
स्नेह के कुंज में शांति शुलभ 
विनय भी है, आवेदन भी है -
हो सहयोग क्षितिज का आलंबन 
विश्वास भी है प्रतिवेदन भी है -
संकल्प हृदय का आभूषण है
वर प्रज्ञा का निकेतन भी है
पीर के मर्म में वत्सलता धीर भी है 
नीर भी है अतिरंजन भी है -

उदय वीर सिंह



शनिवार, 21 जनवरी 2017

आदर्श गगन सा ऊंचा

मानस में सौगात सृजन की 
आँखों में अपनापन हो -
जिह्वा से पीयूष धार बहे 
हृदय में प्रीत आराधन हो -
बाहों में प्यार का सागर हो 
आदर्श गगन सा ऊंचा 
संकल्प  हमारे राष्ट्र हेतु 
जीवन से दूर सूनापन हो -

उदय वीर सिंह


रविवार, 15 जनवरी 2017

त्यागकर विष-बेल ग्रंथियां

आएगी शाम लेकर भोर
यह सोचता क्यों नहीं
त्यागकर विष-बेल ग्रंथियां
प्रसून रोपता क्यों नहीं -
अग्नि पथ  की रीत अजेहि
निर्वाण  देखता क्यों नहीं
सत्य-पथ की प्रीत प्रखर
कल्याण देखता क्यों नहीं -
प्रहेलिका की वीथियाँ में
निष्कर्ष का प्रयास कर
उलझे हुए क्षितिज के मध्य
राह ढूँढता क्यों नहीं -
अग्नि के सोतों  में भी
जीवन को पनपते देखा है
दुर्गम धार प्रवाहों में
पाँव रोकता क्यों नहीं -

उदय वीर सिंह 







शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

लोड़ी की लख लख बधाई ...

आसमान बदला तापमान बदला ,
लोड़ी आई कि खुशी आई ..... । 
लोड़ी के पावन पर्व की भारतीय व अप्रवासी भारतीय संस्कृति के वाहकों को हृदय तल से लख लख बधाई व शुभकामनायें जहां भी हो खुशियों का आकाश, यश वैभव अमन का असीम क्षितिज मिले ..... ।
उदय वीर सिंह

बुधवार, 11 जनवरी 2017

निर्धन की क्या जाति बता दो -

वेदन का क्या संवत्सर क्या है
निर्धन की क्या जाति बता दो -
क्या दुर्जन का धर्म है वर्णित
सज्जन की क्या जाति बता दो -
आँखों के आँसू किसके कैदी हैं 
प्रेम के पाँव लगी जंजीरें क्यों
वीर मानवता का रंग है कैसा
मानव की क्या जाति बता दो -
रुधिर एक ही तन में बहता
गोरा कहीं  न काला बहता
रब के साँचे मानव ढलता
अपराधी की जाति बता दो -
जब धर्मों का गंतव्य एक है
ले दया प्रेम करुणा के पथ
औजारों से नेह क्यों टूटा
हथियारों की जाति बता दो -
उदय वीर सिंह

रविवार, 8 जनवरी 2017

पर्वत सी शपथ

पर्वत सी शपथ  वादों के सागर 
ख्वाबों के तूफान जीने कब देते हैं -
पतझड के खंजर आघात कुटिल
देकर जख्मों को, सीने कब देते हैं -
मृग- मरीचिका की  देकर प्यास
स्वच्छ शीतल जल पीने कब देते हैं -
भरकर नैराश्य आतप जीवन में
दीपक आशा के जलने  कब देते हैं -

उदय वीर सिंह

बुधवार, 4 जनवरी 2017

दशमेश पिता तेरी दुनियाँ में-

कोई नीच नहीं  कोई उंच नहीं 
दशमेश पिता तेरी दुनियाँ में-
मानुष की एक जाति बताई 
बाबे एक रब तेरी दुनियाँ में-
तेरे त्याग दया करुणा बल की 
नित ज्योति जले इस दुनियाँ में-
आपे ही गुरु, आपे ही चेला 
नव -रीत बनाई दुनियाँ में-
चहुं ओर दिगंत  मही जैकारे 
क्या सरदार बनाई दुनियाँ में -

उदय वीर सिंह 




उठो विजय के दीप जलाने

उठो विजय के दीप जलाने 
गंतव्य बुलाता है -
गीत सुनो उन धुन साजो से
जो गंतव्य सुनता है -
साहस संकल्प संभारों अब
जय द्वार बुलाता है
नतमस्तक होगे  गिरि शिला 
तेरा उद्धार बुलाता है

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

प्रशस्त करो नव वर्ष के नव पथ, नव सोपान..

पथ पीड़ा के जागृत होते
जा प्रेम के आँगन हँसते हैं
अवशाद रुदन की राह जा
पथ में गिरते हैं उठते हैं -
मन की हार लिखनी होगी
ऋतु संवत्सर आते जाते
अखंड दीप की रचना करना
अंधड़ में शास्वत जलते हैं -


उदय वीर सिंह

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

आदर्शों को कुचल रहे... शपथ आदर्श की लेते हैं

वो नारों पर जीते हैं
हम नारों को जीते हैं
उनके हाथों में हाला
हम आँसू को पीते हैं -
सत्ता इनका गंतव्य
सेवा का आडंबर है
आदर्शों को कुचल रहे
शपथ आदर्श की लेते हैं
याद नहीं कल के वादे
जो मंचो से कहते हैं
पूरी होगी अपनी आशा
हम आश लगाए रहते हैं -
उनकी महफिल चाँद सितारे
चूर नशे में हँसते हैं
हम बेबस चौबारे गलियाँ
ले भूख यतिमी रोते हैं -

उदय वीर सिंह