सोमवार, 30 नवंबर 2020

प्रकाश पर्व की लख लख बधाई ....

 पावन गुरु पर्व की लख लख

बधाई
......
" सतिगुरु नानक परगटिया ,मिटी धुंध जग चानण होया " गुरुवाणी
" नानक नाम जहाज है, चढ़े सो उतारे पार ....."
" कोई बोले राम राम कोई अलाए .कोई सेवे गुसैयाँ कोई खुदाए " गुरुवाणी
" हम मैले तुम उज्जल करते ....हम निर्गुण तू दाता ....]- गुरुवाणी
" फिर उठी आखिर सदा तौहीद की पंजाब से ,
हिन्द को एक मर्द-ए-कामिल ने जगाया ख्वाब से " डॉ अल्लामा इकबाल
-सिक्ख पंथ के आदि गुरु [प्रथम गुरु ]श्री गुरुनानक देव जी महाराज के पावन प्रकाश-पर्व पर समस्त मानव-जाति को लख लख
बधाई
व शुभकामनाएं /
" यतीम था ये जहान बाबे ...
आप आये गुलजार हो गया -
बे-नूर को को दाते ! तूने नूर कर दिया
ख़ाक -ए -दयार को कोहेनूर कर दिया -
उदय वीर सिंह



सोमवार, 23 नवंबर 2020

कह रहे लोग ....

 आंच शोलों को थोड़ी भी कम न हुयी

कह रहे लोग बारिस बदलियाँ बिक गयीं -
ये तो अच्छा हुआ दीप बे-खौफ हैं ,
कह रहे लोग आखिर आंधियां बिक गयीं -
अपने दामन में भरते थे चुन चुन के गुल ,
कह रहे लोग कामिल वादियाँ बिक गयीं -
गुनाहगारों की बस्ती कितनी गुलज़ार है ,
कह रहे लोग बादल-बिजलियाँ बिक गयीं -
बाढ़ आई चमन, कितनी काँटों की है ,
कह रहे लोग आरे -आरियाँ बिक गयीं -
उदय वीर सिंह


शनिवार, 21 नवंबर 2020

दीप की बातें करता है ...

 वतन निराला है अपना ,ये प्रीत की बातें करता है।

डरता न डराता मंत्र जपे,ये नीति की बातें करता है।
अनमोल धरा का मंदिर है,वासी हैं देव धरा के हम,
दुनियां करती बारूद की बातें, ये दीप की बातें करता है।
सत्य अहिंसा दया प्रेम की धार यहीं से निकली है,
भारत का पवन परिंदा भी नव गीत की बातें करता है।
मानवता की वलिवेदी पर,न्यौछावर सौ बार शपथ,
हर मनुज दिवाली बैसाखी,रंग ईद की बातें करता है।
उदय वीर सिंह।


सोमवार, 16 नवंबर 2020

किसान मांगता है

 रत्न ,सोना जवाहर ,न लाल, मांगता है

फसलों की कीमत हर साल मांगता है-
खुली सडकों पर सड़ने को मजबूर दाने ,
श्रम कमाई का आधा दलाल मांगता है -
दे खून और पसीना अरमान बीजता है ,
वीर फांसी का फंदा किसान मांगता -
आँखों में आंसू ,पीर ,दामन में शोले ,
कर्ज में बैंक ,लाला हलाल मांगता है -
रोटी पढाई ,दवाई सगाई के सपने ,
हो रहे दफन कैसे ,सवाल मांगता है -
रात लम्बी हुयी ,पीर पर्वत हुयी
अब पगड़ी सम्हालो मशाल मांगता है -
उदय वीर सिंह

गुरुवार, 12 नवंबर 2020

फरेबों की महफ़िल .....

 गरीबी की नुमाईश, कला हो गयी।

फरेबों की महफ़िल करबला हो गयी।
चल खेलते हैं गरीबी -गरीबी सनम,
ओढ़ रेशम गरीबी ,निर्मला हो गयी ।
हमने उत्सव के ढूंढें ठिकाने बहुत,
गुरबती से ही ढकी मिली हर गली ,
कुछ अवसर मिले ऊँचे बिकते हुए,
यहाँ खोली बेबसी की किला हो गयी।
उदय वीर सिंह।
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रविवार, 25 अक्तूबर 2020

पत्थर मूरत बनना चाहता है ....

 पत्थर भी मूरत में ढलना चाहता है

बहुतअंधेरा है दीप जलना चाहता है।


अंतहीन होती वेदना भोर होनी चाहिए
अश्व न स्वछन्द हो बागडोर होनी चाहिए।
शब्दों को अधरों से निकलने तो दीजिये।
पावनी रस-धार को बहने तो दीजिये।
अब खान से हीरा निकलना चाहता है।
बहुत जीया गह्वर नें चमकना चाहता है।
प्रतीक्षा में आज भी उनको तो सुनना होगा।
दंड मिले या पुरस्कार, कुछ तो कहना होगा।
प्रारब्ध रेत का क्या है,कुछ मरुधर बोलो ।
मधु बसंत के द्वार बंद ,कर साहस खोलो।
उदय वीर सिंह

भूख का मारा शिक्षालय नहीं जाता .....

 पानी का बहाव हिमालय नहीं जाता

भूख का मारा शिक्षालय नहीं जाता।
होती जिसे माण सम्मान की चिंता,
वो सज्जन मदिरालय नहीं जाता ।
आवारा बादलों की छांव कबतक ?
पवन जितनी विरमित रहती जब तक ,
सिद्धार्थ जाते हैं सत्य अन्वेषणार्थ,
ज्ञानी जाता है,ग्रंथालय नहीं जाता।
जिसने भी लिखे होंगे गीत प्रेम के,
वो वन नहीं मधुवन के वासी होंगे,
मधुपों को भातीं पुष्प वीथियाँ ,
तज कुसुम की बांह देवालय नहीं जाता।

उदय वीर सिंह

रविवार, 18 अक्तूबर 2020

डरा हुआ जातक .......

डरा हुआ जातक ,सौ बार मरा करता है।

अक्षम मानव,याचन से उदर भरा करता है।
आंखों का पानी मर जाए,सिकन नहीं भालों पर,
सम्मान बेचने वाला,बारंबार गिरा करता है।
पावन वेद कुरान ग्रंथ,उद्धरण अनेकों जिह्वा पर,
जीवन मूल्यों से अक्सर,वो दूर हुआ करता है।
पाषाण कवच का ओढ़ आवरण,मौन गिरी को पाया,
ले जीवन की लोक कामना,निर्मल नीर झरा करता है।
उदय वीर सिंह
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सोमवार, 21 सितंबर 2020

दर्पण भी न पढ़ पाया


 दर्पण भी ना पढ़ पाया ,

मुख के रंग -रंगोली को ।
कर जोड़े मुस्कान अधर
मानस की घात ठिठोली को ।
रेशम के वस्त्रों में लिपटा ,
काँटों का उपहार मिला ,
स्वाति की बूंद में बैठे थे ,
अम्लीय नीर घन खार मिला।
रोयेंगी सदियां जार-जार,
घावों को भर ना पाएंगी,
कारा, दासत्व की पीर अकथ,
इतिहास पुनः दुहरायेंगी।
उदय वीर सिंह ।