रविवार, 28 नवंबर 2021

नयन जागते रहे....


 








अजनवियों कीभीड़अपना तलाशता रहा।

नयन जागते रहे सपना तलाशता रहा।

पहचान कर सब ले गए अपनीअमानतें

मेरी कहाँ बचीं हर कोना तलाशता रहा।

बोई उम्मीद की फसल बरसात ले गई,

वायदों की थाली, दाना तलाशता रहा।

मुख़्तलिफ़ किताबों के पन्ने पलट गया,

जाती ज़िंदगीका अफ़साना तलाशता रहा।

उदय वीर सिंह।

गुरुवार, 25 नवंबर 2021










जब अर्थ समझ में आया,

वो गीत हृदय से विसर गया।

वेदन को अश्लील कहे,

वो दृश्य नयन से उतर गया।

पत्थर तब तक,पत्थर था,

प्रीत मिली तो बिखर गया।

संवेदन को जो पंख मिला,

भाव हृदय भर शिखर गया।

महलों में थी ताप-तपिश कटु,

तरु छांव मुसाफ़िर ठहर गया।

भय गुलाब को छू न सका,

कांटों में भी निखर गया।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 23 नवंबर 2021

दिल में लिखी है अजमत....









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छीना नहीं बख्सा है रब ने स्वीकार करते हैं।

रब का नूर आला है वो सबसे प्यार करते हैं।

रोक देती है चलने से पहले शमशीर खुद को,

जब हकपसंदों पर जबर ज़ालिम वार करते हैं।

दूध और खून की रोटी बयां करती हैं फ़ासले,

बेचते नहीं बचाकर वतन पर निसार करते हैं।

कपड़ों पर नहीं दिल में लिखी है अज़मत,

मकबूलियत है सच्चे सौदेका व्यापार करते हैं।

उदय वीर सिंह।

सोमवार, 22 नवंबर 2021

परिन्दा एक पूरा शज़र चाहता है...









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शज़र है कि सारा शहर चाहता है।

परिन्दा एक सारा शज़र चाहता है।

साथ हैं जश्न है ,फ़ासले अलविदा,

सफ़र एक सदा हमसफ़र चाहता है।

आईने की हिफाज़त जरूरी समझ,

संगभी अपने भीतर ज़िगर चाहता है।

बरसा बादल बहा नीर सागर चला,

बुलबुला भी एक लंबी उमर चाहता है।

रास्ते हैं, बहुत से मुसाफ़िर भी हैं,

एक बे-नैन वाला नज़र चाहता है।

उदय वीर सिंह।

मंगलवार, 9 नवंबर 2021

दहशत भरी ख़ामोशी


 








दहशतभरी ख़ामोशी समाधान नहीं होती।

काया से लिपटी लंगोटी परिधान नहीं होती।

मुसाफ़िर हैं हम ठहर जाते हैं नमी पाकर,

किसी दरख़्त की छाया, मकान नहीं होती।

पैगाम देते हैं टूटे कांच व पत्थरों से भरे कूँचे,

दीन की बे-अदबी दीन की शान नहीं होती।

अख़लाक़ है कि हम मिटते हैं इंसाफ पर,

वायदाफ़रोशों की कोई जबान नहीं होती।

हर जमीं-जर्रों में हिन्दुतान की महक है, 

ये मां है सबकी है किसीके नाम नहीं होती।

उदय वीर सिंह।

शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

तम न रहे...









 🙏

तम न रहे, दिल में ग़म न रहे।

प्रीत के गांव में प्रीत कम न रहे।

हर दर्द की है सदा एक सी,

सिर्फ़ उलफ़त रहे जी सितम न रहे।

छोड़ आएं अंधेरों को गह्वर किसी,

दिल हर्षित रहे आंख नम न रहे।

उदय वीर सिंह।

गुरुवार, 4 नवंबर 2021


 







बंदी छोड़ दिवस( 52 कैदी हिन्दू राजाओं की मुक्ति )व ज्योति पर्व की लख-लख बधाई मित्रों।

मुकद्दर में सबके उजाला रहे।

मस्जिद किसी को शिवाला रहे।

कपड़ा और घर की कमीं न रहे,

सबकी थाली मयस्सर निवाला रहे।

घर आंगन में दीपक मुक़द्दस रहे

हिफ़ाजत में दामन का साया रहे।

उदय वीर सिंह।

सोमवार, 1 नवंबर 2021

अपनी छुपाता बहुत है।


 





होकर अपनी साज़िश में कामयाब 

मुस्कराता बहुत है।

लगे जिसपर अनेकों दाग उंगलियां 

उठाता बहुत है।

परहेज है जिसे सच बोलने से वो 

कसमें खाता बहुत है।

चाहता है सुनना सबकी बातें मगर 

अपनी छुपाता बहुत है।

जलता है गैरों की बुलंदियों से 

इंतकाम में जलाता बहुत है।

पसंद नहीं जो जमाने को राग 

उनको गाता बहुत है।

मालुम है सबको जो मुमकिन नहीं

वो ख़्वाब दिखाता बहुत है।

वजूद ही नहीं माज़ी में जिस दास्ताँ का,

उन्हें सुनाता बहुत है।

उदय वीर सिंह।

रविवार, 24 अक्तूबर 2021

भरोषा टूटता चला गया,....









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भरोषा था अपनों पर,

टूटता चला गया।

आयी गर्दिशी तो हाथ,

छूटता चला गया।

मुखबिरी अपनों ने क़ी,

गैर लूटता चला गया।

कच्चा घड़ा था वो नेह,

बूंद पड़ी गलता चला गया।

न बहा गर्दिशी के दौर,

आज बहता चला गया।

पीर में कोई बुलबुला था वीर,

फूटता चला गया।

उदय वीर सिंह।

सोमवार, 18 अक्तूबर 2021

मसीहाई जुबान का शहजादा...


 






मसीहाई जुबान का शहजादा...

बहुत गुरुर था सल्तनत का उसे जमाना  निगल गया।

ली थी शराफत की जिम्मेदारी दीवाना निकल गया।

मालूम है कैफ़ियत जहां वालों को फिर भी दाद देते हैं,

सच मान लिया था जिसको वो फ़साना निकल गया।

सिजदे में रहा ता-उम्र भरोषा था उसकी दरो दीवार का,

गया था इंसाफ-घर समझ वो मयख़ाना निकल गया।

मसीहाई जुबान का शहजादा दे सपनों की सल्तनत,

फिर लौट कर नहीं आया, जमाना निकल गया

उदय वीर सिंह।