बुधवार, 28 नवंबर 2018

तेरे आँचल की छाँव मिली -


आपके आँचल की ओट -
आज एक सुखद अहसास हुआ की मेरी भी रचनाएँ आप सुधि जनों को व अन्य लोगों को पसंद आती हैं ,वास्तविकता है की मेरी व्यस्तता व उत्तरदायित्वों ने मुझे बंधक सा बना दिया है । मैं महसूस करता हूँ -
" आगे चाहता हूँ चलना काफिले संग ,
पीछे देखता हूँ आंसुओं को बहते हुए
कभी कहा नहीं कि तूं ठहर जा ,
पर देखता हूँ उनको ठहरते हुए
मैं चाहता हूँ आगे पकड़ना उंगलियाँ ,
पीछे देखता हूँ अपनी उंगलियाँ पकड़ते हुए " -
फिर भी सतत चलने का प्रयास /संकल्प संग लिए रत हूँ ,ऐसे कठिन डगर / सफ़र में साहित्य /गैर साहित्य प्रेमियों,का साथ संबल मिलता है ,मेरा सौभाग्य है मेरी अभिव्यक्तियों को पढ़ना आदर देना [आलोचना /समालोचना के सन्दर्भों में ] मैं कृपा -प्रसाद स्वरुप स्वीकार करता हूँ
मेरी रचनाओं को [ कविता /कहानियों लेखों ] को मेरे ब्लॉगों ' उन्नयन '
' सिफ़त ' फेसबुक-सृजन को भरपूर स्नेह व सम्मान, साहित्य प्रेमियों ,आत्मीयों ने दिया है, जिससे मैं अनजान सा था । आज सुखद आश्चर्य हुआ जान कर , ह्रदय से शुक्रगुजार हूँ उनका जिन्हों ने मेरे रचनाधर्मिता को समय व सहृदयता से उनका संज्ञान लिया । मेरी दुनियावी बाध्यताओं की सीमा अब असीमित से लगता है सिमित सी हो गयी है ।
क्षमा प्रार्थी हूँ ,किसी अनादर ,अज्ञानता के लिए जो संभव है , अगर कहीं किसी से हो गयी हो। मैं इस योग्य नहीं की आप साहित्य मनीषियों की सी ऊंचाई की कल्पना भी करूँ , अनुसरण करना चाहता हूँ ..काफी है इतना स्नेह व सरोकार ।
" वो दीप बुझे भी कैसे ..तेरे आँचल की ओट जो पायी है '
विनयवत आभार ।
उदय वीर सिंह




सोमवार, 26 नवंबर 2018

सम्मान चाहिए था जी -


रोटी कपड़ा जीवन को
मकान चाहिए था जी
शिक्षा और सुरक्षा सुख
सम्मान चाहिए था जी -
एक ही चमन के वारिस 
एक पहचान चाहिए था जी -
कैसे गोरे काले एक
इन्सान चाहिए था जी-
कश्मीर से कुमारी कन्या
एक हिन्दुस्तान चाहिए था जी -
कैसा उंच नीच भेद 
जाति वर्ग वाद कैसा ?
हम सब भारतवासी एक
जुबान चाहिए था जी -
उदय वीर सिंह


मंगलवार, 20 नवंबर 2018

कर्ण सदा दुत्कारे जाते हैं ....


किससे मांगोगे दान
कर्ण सदा दुत्कारे जाते हैं
कोख का मौन गुरु समाज के श्राप
छल से शीश उतारे जाते हैं -

अर्जुन को आरक्षण विधि मान्य
गुण शौर्य सदा किनारे जाते हैं
किसका गाओगे विजय गान
अपनों से अपने मारे जाते हैं -

छल को स्थान रणनीति कहें
बल को ईश्वर का प्रतिरूप
न्याय उदासी करे प्रतीक्षा
जब सत्य शील विसारे जाते हैं -

उदय वीर सिंह