शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

मानविंदु समर्थ योगी

जिसने योगी को समझा है
उसने जीवन को समझा है
वेदन क्या ,आँसू क्या होता है
उसने मानस मन को समझा है -
वैराग्य समर्थ का स्पंदन है
अनबोलों का क्रंदन समझा है
वनवासी वनजीवों का मीत
अभिनंदन कर वंदन समझा है -
नारी अबला का मान विंदु
मर्यादा का मर्दन समझा है -
ज्योति नयन हंसी अधरों को
बेकस का अतिरंजन समझा है -
दम तोड़ती आशाओं का
अपेक्षाओं का सुंदरतम समझा है
जनमानस को ताबेदार समझती
तानाशाही का अन्तर्मन समझा है -
उदय वीर सिंह




गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

झुकते हैं हजारों सिर

झुकते हैं हजारों सिर
स्वागतम  के लिए
मिलते बहुत ही कम
कटाने को वतन के लिए
शोहरत न.कोई तमगा 
उनको नहीं ,लुभाता
आँचल ही माँ का काफी
उनके कफन के    लिए
ठहरे हुए हैं पाँव बुत से
बहता रहा लहू सड़कों पर बेशुमार
देने वाले कम हैं 
इंसानो चमन,के लिए 

उदय वीर सिंह 

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

क्यों रोये माटी का पूत -

आँख भरी आंचल खाली है
भरे गोदाम खाली थाली है
अन्न दाता याचक बन रोये
स्वप्न भरे हैं घर खाली है -
कर्जों से उनकी भरी किताबें
बटुआ मुद्रा से खाली है -
अंग -प्रत्यंग है कर्ज भरा .
खुशहाली से जीवन खाली है -
सजे मंदिर मसीत गिरजा गुरुद्वारे
बे-पर्दा किसान आँगन .खाली है -
शिगाफों ,से तन ,दिखता है ..
चिथड़े वसन हैं माँ बेटी के
आनंद मनाता साहूकार
देख लहलहाती अपनी खेती के -
जर जोरू जमीन का सौदा
वो करते हुए सवाली है
क्यों आत्महत्या का पथ चुनता
स्वर राजपथों से खाली है
उदय वीर सिंह

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

किसकी शाख किसके फल

किसकी शाख किसके फल लगने लगे 
केशर की क्यारियों में  जहर उगने लगे -
हर खुशी हर गम में शरीक थे कुनबे 
अब रोटी भी हिन्दू मुसलमान की कहने लगे -
जो हाथ उठते थे मोहब्बत से दुआओं के 
उस हाथ से बेमुरौअत पत्थर चलने लगे-
कश्मीर आतंक का नहीं मोहब्बत का घर था 
आज घर आतंकी दड़बों में बदलने लगे -

उदय वीर सिंह 


रविवार, 16 अप्रैल 2017

पत्थरबाजों से -

पत्थरबाजों से -
जो तेरी सलामती की निगहबानी में है
वो क्यो आज तुमसे ही परेशानी में है -
सुन बेकस खौफजदा रूहें आवाज देती है ..
हो हकीकत से दूर तूँ कितनी नादानी में है -
वतन नहीं तोड़ सकते तेरे हाथ के पत्थर
शायद तूँ किसी ख्वाब में है या कहानी में है -
ये किसी कौम या मजहब का नहीं है वतन
यहाँ फरजंद रहते हैं तूँ किसी बद्दगुमानी में है -
उदय वीर सिंह

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

खोखली जड़ों के पेड़ जिंदा नहीं रहते

तूने जिसे छूआ  नहीं अछूत समझकर 
दुनियाँ ने अपनायाउसे सपूत समझकर 
ईश्वर ने बनाया जीव बनाई तुमने जाति
मानवता ने अपनाया उसे दूत समझकर 
खोखली जड़ों के पेड़ जिंदा नहीं रहते 
परिंदे भी छोड़ जाते हैं कमजोर समझ कर -
उदय वीर सिंह 

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

बबूल को अमलतास लिखते रहे -

सदियाँ अभिशप्त ती रहीं  रहीं 
रंगमहल का इतिहास लिखते रहे 
तड़फता रहा अँधेरों में जीवन 
उजला उजला आकाश लिखते रहे -
धर्म और देश सतत बिखरता रहा 
बिखेरने वालों को खास लिखते रहे -
आंसू वेदन अन्यायी अनुशीलन था 
कामसूत्रीय परिहास लिखते रहे -
पतझर वसंत का भेद न देखा 
बबूल को अमलतास लिखते रहे -

उदय वीर सिंह 

बैसाखी के आँचल से अनमोल सदाएँ सुना रहा ...

बैसाखी के आँचल से अनमोल सदाएँ सुना रहा ... 
***
अप्रतिम त्याग वलिदान संकल्प युगनिर्माण का दिवस बैसाखी -
तिथि 13 अप्रैल 1699 स्थान आनंदपुर साहिब पंजाब दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज द्वारा खालसा पंथ की स्थापना की जाती है । सिक्ख संगत समस्त भारतीय प्रायदीप से अपनी अविस्मरणीय सहभागिता  प्रस्तुत करती है। युग इतिहास में तन मन धन अर्पण की पराकाष्ठा बनती है बैसाखी । आर्थिक सामाजिक भौगोलिक ही नहीं आध्यात्मिक स्थिति में आमूल चूल परिवर्तन होता है जिसकी कल्पना मुगल ही नहीं वैदिक कालखंडों में संभव नहीं थी ।स्मरणीय हो  उस समय- काल में दूर संचार, आवागमन, शिक्षा लगभग सुसुप्तावस्था में थी । लोक जागरण का  कार्य कितना दुरूह रहा होगा ।आनंदपुर साहिब का सिक्ख समागम दसवें गुरु की सामाजिक धार्मिक राजनैतिक जागरण प्रेरणा पारलौकिक संस्थापना का हस्ताक्षर बनता है । बिखरा हुआ समाज विपन्नता का समाज, क्रिसकाय  बीमार ,निराश भयातुर समाज ,,द्वेष भेदभाव अन्याय की बेड़ियों में जकड़ा हुआ  उपेक्षा दलन,प्रतिबंधों का  मारा भारतीय  जनमानस गुरु गोबिन्द सिंह की ओट ले अपनी मुक्ति का संखनाद करता है । अतुलनीय संवेदी घटना, अविस्मरणीय तिथि अकल्पनीय दर्शन अवर्णनीय  त्याग अकथनीय संकल्प शौर्य का प्रस्फुटिकरण आकार लेता है । परिणाम स्वरूप बैसाखी साक्ष्य बनती है हमारे उद्धार व उन्नत स्वरूप का ..... । 
    लोकशाही लोकमत लोकाभिव्यक्ति को स्थान मिलता है उनका शुभागमन का कृतज्ञता के साथ  हृदय से स्वागतम  होता है । पंचप्यारों का दर्शन हमारे भारतीय जनमानस का अटूट अभिन्न अंग बनता है । भारतीय इतिहास में नवीन परंपरा का उनवान होता है " आपे गुरु -चेला "  "गुरु ही शिष्य ,शिष्य ही गुरु "जिसकी कल्पना संभव नहीं थी हमारे भारतीय जनमानस में चरितार्थ हुई ।आदर्शों अनुशीलन और अनुषंषाओं से निर्देशित हो अकथ वलिदानों  संघर्षों प्रायसो से भारतीय समाज वेदना आतंक और परतंत्रता से मुक्ति पाता है ।
खालसा के बाद का जीवन -
   देश क्या है ? देश का अर्थ क्या है ? परिभाषित होता है । धर्म क्या है ? धर्म की परिभाषा क्या है ? लोक मानस में स्थापित होती है । पूर्व की जड़ता, अंधता वैमनस्यता खोखले अहंकार आत्म मुग्धता की जगह खालसा  का विचार संचारित होता है । टूट जाते हैं  सारे बंध बेड़ियाँ शृंखलाएँ मिट जाते हैं सारे भेद अलोप हो जाती है वर्णता तथाकथित उच्चता ,शेष्ठता, शुद्धता ,खालसा की प्रचंड अग्नि में तपकर अशेष  देदीप्यमान मनुष्यता रह जाती है । गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज स्पष्ट करते हैं - " मानुख की जात सब एकै पछानिबों "
आतंक और आतताईयों के समूल नाश की प्रवृत्ति विकसित होती है  मूल्य और संस्कारों  को प्रमुखता मिलती है देश और धर्म की वलि वेदी पर आत्मोत्सर्ग की अटल भावना प्रस्फुटित होती है जो कालांतर में भारतीय इतिहास को हर सदी में गौर्वान्वित करती रही है । 
समाज की विषमताओं का संग्यान प्रमुखता से लिया जाता है अंधकूपता अतार्किकता ,अंधविस्वास का नकारा जाना खालसा के बाद के जीवन की प्रमुख घाटना है जिसे सार्थक अर्थों में जनमानस स्वीकार करता है । सरल सुबोध सात्विक जीवन शैली का उन्नयन ध्येय बनता है । ईश्वर की सत्ता और एकरूपता का दर्शन निःसन्देह बली होता जाता है । गुरु रूप परमात्मा का अभियोजक जीवन सन्मार्ग का प्रेरक बनता जाता है । परमात्मा से जोड़ने का अप्रतिम पथ गुरु होता है । 
ज्ञान विज्ञान और साहित्य के क्षेत्र में परिवर्तन और नवीनता स्थान लेती है समय कालानुसार निज संकल्प पर अडिग हो मानवता के कल्याणार्थ आत्मत्सर्ग का बीज सदैव संचित रहता है । लोभ  भय कदाचार असभ्यता से मुक्ति संशय का विस्थापन एक सिक्ख का आचरण बनाता है । गुरु गोबिन्द सिंह जी कहते हैं -
" मुझे सिक्ख नहीं उसकी रहत [ अनुशासन ,मर्यादा ] प्यारी है "। 
   खालसा के श्रीमुख से तौहीद की आवाज बुलंद होती है चुनौतियों  को अवसर बनाना एकता का अटल अनमोल अनवरत संघर्ष विजय तक  कायम रखना सत्कर्मों से विमुख न होना खालसा का प्रथम अदध्याय बना । आद्यतन अनवरत साथ है । 
    खालसा के विरोध में भी स्वर कम नहीं थे ,जड़ता अमानवीय धर्मांधता के पोषक आतंकी आतताईयों के समर्थक रहे समाज परिवर्तन के घोर विरोधी विदेशियों का सिंचन करते रहे गुरु सिकखी का धूर वैचारिक  विरोध ही नहीं अनेक साक्ष्य तिथियों में रनभूमि में भी सशरीर उपष्ठित हो युद्ध भी किए । पर खालसा का नारा और परचम बुलंद रहा, राष्ट्र और संस्कृति महफूज रहे । 
      कालांतर की हर सदी में खालसा अपने अप्रतिम  रूप में आदर्श बन कर अपनी अलग पहचान छोड़ता गया प्यार स्नेह सहयोग देता रहा और पाता भी रहा , न सिर्फ भारत भूमि बल्कि समस्त विश्व में वह अग्रणी पहचान के समर्थ स्वरूप है । उसके आदर्श ,प्रतिमान, उसके कर्म ,स्वरूप ,दर्शन मानव मात्र को आकर्षित ही नहीं सद्भाव व सन्मार्ग हित प्रेरित करते हैं  । 
     अपने प्रेम त्याग वलिदान आदर्शों संकल्पों की अकूत अखंड पूंजी लिए खालसा जीवन के समस्त अर्थों में स्पष्ट व अतुलनीय है । पोषित है गुरुओं की दात से मानव मात्र की संवेदना बनकर । 
खालसा मेरो रूप है खास ।खलसे मैं करूँ निवास -गुरु गोबिन्द सिंह जी । 
उदय वीर सिंह 

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

आँचल में प्रेम पयोधि भरे

पानी में प्रतिविम्ब उतरता है
पानी मे चित्र नहीं बनते
जब पैर विबाई साथ रही 
विपदा में मित्र नहीं मिलते-
जब गंगा ही मैली हो जाती 
नीर पवित्र नहीं मिलते
जब छोड़ गया उपवन को माली 
पुष्पों से इत्र नहीं मिलते
आँचल में प्रेम पयोधि भरे 
खोजे भी शत्रु नहीं मिलते-
उदय वीर सिंह



मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

बेटी के रोने की खबर फिर से आई है

बेटी के रोने की खबर फिर से आई है
बीती है सदियाँ कितनी अब भी पराई है -
खंजर हुए हाथ आँचल विष का कटोरा हुआ
ममता की आँखों में मौत उतर आई है -
हाथ हथकड़ियाँ पग बेड़ियाँ अनेकों हैं
धरती का बोझ मानो बेटी बन आई है -
फिसला जो पैर माफी मिलती न बेटी को
आशीष वाले हाथों ने जिंदगी जलायी है

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

साये न मिलते हैं, सितारे न मिलते हैं -

दूर करके किश्ती को किनारे न मिलते हैं
छोड़ करके रब का दर सहारे न मिलते हैं
रिश्ते तो मिलते हैं मातब की दुनियाँ में
बापू बेबे के नेहा सा पियारे न मिलते हैं
सरबती दिनों में सोख चश्मों का पानी है
सर्द  भरी रातों में अंगारे न मिलते हैं -
अमावस की रात का आगमन जो होता है
साये न मिलते हैं, सितारे न मिलते हैं -
उदय वीर सिंह

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

क्या दौर है शराब को,

क्या दौर है शराब को
निवाला कह रहे हैं 
टकराते जहां पर जाम,
शिवाला कह रहे हैं -
हुई निलाम सरेआम 
मोहब्बत की कली 
बेचा जिसे बाजार में,
घरवाला कह रहे हैं -
जब्त करले मसर्रत ही नहीं
अहसासों को भी 
हो अख़्तियार खुद पर
ताला कह रहे हैं -

उदय वीर सिंह



शुक्रवार, 31 मार्च 2017

जय होने क अर्थ नहीं

जय  होने क अर्थ नहीं
रण हारा सो हारा है -
हाथों को पतवार  बना
सरिता के पार किनारा है
डूबा सूरज उगता कल
कल क साम्राज्य तुम्हारा है
खींच प्रत्यंचा शर संधान करो
धुन्ध के पीछे उजियारा है -

उदय वीर सिंह 

मंगलवार, 28 मार्च 2017

संवेदन भी खैरात नहीं हैं -

कविता है हालात  नहीं हैं
समस्याएँ हैं सवालात नहीं हैं
हैं घूम रहे छुट्टा पशुओं सम
अपराधी हैं हवालात नहीं हैं -
खामोश हुये लब कैसे कैसे
पीड़ा है खयालात नहीं हैं -
बहता खून है सड़कों पर
रोगी को इमदाद नहीं हैं -
रो रो मांगे  खैर मुकद्दर 
संवेदन भी खैरात नहीं हैं -

उदय वीर सिंह 

रविवार, 26 मार्च 2017

मुश्किल नहीं हैं रोटियाँ -

पीर निकले चीर कर जड़ पर्वतों की चोटियाँ
हाथ में औज़ार हो तो मुश्किल नहीं हैं रोटियाँ -
मुमकिन नहीं हर गाँव मजरा राजपथ के नेड़ हो
हर राजपथ को जोड़ देती हैं पगडंडियाँ -
जब जलेगा दीप तो हर दर उजाला खास है
जो जलेगा दिल उदय बे-रोशन रहेंगी कोठियाँ -
उदय वीर सिंह 


गुरुवार, 23 मार्च 2017

जिसमें मेरा कोई अपराध न था -

झंझावात आए तो, कोई साथ न था
मांगी मदद पर आगे कोई हाथ न था
रहबर भी चले गए अनसुना करके 
नीचे धरती मेरे ऊपर आकाश न था -
ख़िज़ाँ से दूर गुल गुलशन आबाद रहे
इंसानियत को जगह मांगी थोड़ी
सजा मुकर्रर होती गई बेहिसाब
जिसमें मेरा कोई अपराध न था -

उदय वीर सिंह 

बुधवार, 22 मार्च 2017

ये वक्त भी आना था

इश्तिहारों से पीर जानी जाए
ये वक्त भी आना था 
दिल टूटा हथौड़े इतने लगे 
संबंध कागज पर निभाए जाएँ 
ये वक्त भी आना था 
कंधे खाली नहीं कोमल हाथों से 
अर्थी ठेके पर उठाई जाए 
ये वक्त भी आना था -
इंसानियत जाए कोई फर्क नहीं 
नफरत सितम न जाए 
ये वक्त भी आना था -
जन्म दिन पर आएगी माँ बाप की 
शुभ आशीष अनाथालय से 
ये वक्त भी आना था -



सवेरा सो गया जैसे -

बहुत ही लंबी हो गई रात
सवेरा सो गया जैसे -
गया था कहकर आने को 
रास्ता खो गया जैसे -
जले चिराग बुझने को 
किसी का हो गया जैसे -
हो गई पीर बरगद सी 
वेदना बो गया जैसे -
दिशाएँ हैं वहीं अटल अभी 
सूरज  बदल गया जैसे -

उदय वीर सिंह 


मंगलवार, 14 मार्च 2017

अर्थी ठेके पर उठाई जाए

इश्तिहारों से पीर जानी जाएगी 
ये वक्त भी आना था 
दिल टूटा हथौड़े इतने लगे 
संबंध कागज पर निभाए जाएँ 
ये वक्त भी आना था 
कंधे खाली नहीं कोमल हाथों से 
अर्थी ठेके पर उठाई जाए 
ये वक्त भी आना था -
इंसानियत जाए कोई फर्क नहीं 
नफरत सितम न जाए 
ये वक्त भी आना था -
जन्म दिन पर आएगी माँ बाप की 
शुभ आशीष अनाथालय से 
ये वक्त भी आना था -

उदय वीर सिंह 

रविवार, 12 मार्च 2017

जीते या हारों का इतिहास देखिये

जीते या हारों का इतिहास देखिये 
पैसे का खेल, फेल या पास देखिये -
उज्र नहीं है हिंदस्तान की मुफ़लिसी पर 
बैठे बार में उनका परिहास देखिए -
छप्पर,बे-घर उनकी राजनीति के केंद्र 
राजपथों पर उनका आवास देखिये -
बेबस ही रह गया किसान मजदूर शिक्षक 
राजनीति के पुजारियों का विकास देखिये -
मिल जाए जैसे भी संरक्षण का चौराहा 
बना लेते एक नया बाइ-पास देखिये -
उदय वीर सिंह 

शनिवार, 11 मार्च 2017

मूल्यों का अवसान नहीं हो

मूल्यों का अवसान नहीं हो
व्यतिरेक कहीं प्रतिमान हो
आदर्श कहीं अभिमान नहीं हो
धूल-धूसरित सम्मान हो -
पीड़ा के संग संवेदन सरिता
वंचित का अपमान हो
प्रत्याशा का प्रतीकार नहीं हो
सृजन कर्म व्यवधान हो
मद भेद कहीं स्थान पाए
सत्य-पथ में विश्राम हो
सहकार समन्वय गतिहीन नहीं
घर लिप्सा का निर्माण हो
सीमा-विहीन अधिकार नहीं हो
शमशीर कहीं भगवान हो
प्रेमसंजीवन अभिशप्त नहीं हो
मिथ्या विद्वेष महान न हो -
उदय वीर सिंह


बुधवार, 8 मार्च 2017

गीता हैं पुराण हैं हमारी बेटियाँ

नारी शसक्तिकरण को शुभकामनायें ... !

"तनया " बेटियों को समर्पित मेरी पुस्तक से नारी की प्रतिष्ठा में ..
गीता हैं पुराण हैं हमारी बेटियाँ
पूज्य ग्रन्थों का संज्ञान है हमारी बेटियाँ
पुजा का प्रसाद हैं संकल्प की संवेदना
कई जन्मों का सम्मान हैं हमारी बेटियाँ
दुर्दिन की सैश आहात छोड़कर स्वजन चले
उस वक्त की आधार हैं हमारी बेटियाँ
गंगा हैं यमुना हैं सतलज चिनाब हैं
मंगल मलय समीर हैं हमारी बेटियाँ
मंदिर की मुस्कान है मस्जिदी अजान हैं
सत्कर्म की पहचान है हमारी बेटियाँ
न द्वेष बांटती हैं न द्रोह बांटती हैं
सिर्फ स्नेह बांटती हैं हमारी बेटियाँ -.
उदय वीर सिंह .


सोमवार, 6 मार्च 2017

जीवन के सफर में तुम रोए

जीवन के सफर में तुम रोए 
हम रोये तो क्या हुआ -
जीवकी डगर ही अंधी है 
दिल खोये तो क्या हुआ 
पाँव थके जब शाम हुई 
गम धोये तो क्या हुआ 
जीवन मे चाहा फूल उगें 
कांटे उगे तो क्या हुआ -
नजरानों का मौसम है 
कुछ पास नहीं तो क्या हुआ 

रविवार, 5 मार्च 2017

तुमको खुतबा खिताब....

तुमको खुतबा खिताब
मिल जाएंगे
हमे मयस्सर नहीं चिराग
तुमको आफताब
मिल जाएंगे
कहते हो तुम्हारी जमीन में
कांटे नहीं उगते 
ढूंढो जरा गौर से  वीर एक नहीं 
हजार मिल जाएगे ....
तुम्हें गिला है मेरी आवाज से ,
खरीदोगे तो बहुत बे-आवाज
मिल जाएंगे 
उदय वीर सिंह 


गुरुवार, 2 मार्च 2017

बोई पीड़ा की फसलों से

जलते अंतर्मन से कैसे 
 अमृत वर्षा हो पाई -
अभिशप्त हृदय की भाषा कब 
मधुर गीत में ढल पाई 
बोई पीड़ा की फसलों से 
यश खुशहाली कब आई -
वैद्य हकीम बसते बहुतेरे
पीर पर्वत सी हो आई -
घाट देवालय, मधुशाला के भी 
 लगी प्यास बुझ पाई -

- उदय वीर सिंहb

युद्ध विकल्पविहीनता की स्थिति है

युद्ध विकल्पविहीनता की स्थिति है और विकल्प बंद नहीं हैं  
** विजेता की सेना पराजित के मानमर्दन स्वरूप उसकी स्त्रीयों का बलात्कार करता रहा है [इतिहास गवाह है ].... और आज स्वयंभू विजेता वही करने पर आमादा हैं  
**अरे सुखासिनों युद्ध की विभीषिका क्या होती है पीड़ित परिवारों पीड़ित देशों से पुछो ,अगर आँखों में नमीं है उनकी वेदना को महसूस करो शायद अवगत हो सको
** युद्ध ! रंगमहल की महफिल नहीं ,बहते रक्त मवाद आँसू भूख दर्द रुदन असमर्थता विपन्नता याचना यातना अपमान की पराकाष्ठा है युद्ध के उन्मादियों तुम अपने को कहाँ पाते हो आकलन स्वयम करो तो अच्छा है  
युद्ध पीड़ित परिवारों का हाल आज भी क्या है उनके मेडल बिक गए दी गई सहायता राशि आज भी लंबित है जीविकार्थ दी गई जमीने प्रतिष्ठान आज भी लंबित हैं ...... संवेदना कहाँ विलोप हो गई कभी तो सोचो  
** युद्ध में शहीदी किसी राजघराने से नहीं, किसी तथा कथित राजनीतिक परवारों से नहीं, किसी व्यवसायिक अद्योगिक घरानों से नहीं पाई जाती निःसन्देह सामान्य परिवारों से है युद्ध शासकों का सगल है अपनी सत्ता बचाए रखने लिए 
आओ एक पहल करते हैं अगर राष्ट्र प्यारा है तो प्रत्येक परिवार से एक सदस्य राष्ट्र हीत 10 साल तक बिना किसी पारिश्रमिक लिए अर्पित करते हैं मैं दोनों वाम दाम का आव्हान करता हूँ  
** राष्ट्र सेवा राजनीति नहीं है ,षडयंत्र नहीं है अर्पण का प्रतिदान नहीं है मुंह देखी गाथा नहीं कर्म की अनुषंशा हैअमिट हस्ताक्षर है केवल और केवल सर्वहित का मंगल संकल्प है,जिससे युद्ध प्रलापियों का कोई वास्ता नहीं
है  
जे प्रेम खेदन का चावो ,शिर धर तली गली मोरे आवो 
जे मरग पैर धरिजे शीश दिजे कान्ह कीजे { गुरु गोबिन्द सिंह }
उदय वीर सिंह