गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

सार्थक सोच

अभिनन्दन है विस्थापन है ,
  अभिषेक   कहीं  सूनापन है ,
    अंतर्विरोध   के     युग्मों में ,
       पराया    है     अपनापन   है -


ताप ,तृष्णा  की ज्वाला है ,
  ईर्ष्या  की   तपती शाला है ,
    द्वेष ,दंभ ,पाखंड   के   नाले ,
      गंगा    की   पावन   धारा  है -


शूलों ने नैराश्य संजोया ,
    फूलों का हँसता आँगन है -


चक्षुहीन ,अंतस  की ऑंखें ,
   लिपीहीन    वक्तव्यों      में ,
      ग्रंथों    के     विश्लेषण   हैं ,
        आवद्ध कहाँ  कब शब्दों में-


विचलन    है,   स्पंदन   है
   अपकार , कहीं   अराधन  है-


अनुशीलन  है, अध्यापन  है,
   संवेग   कहीं    बहरापन   है,
    जीवन  के  तथ्य  तंतुओं का ,
       बंधन   है   , बिखरापन     है -


अविरल प्रेम के स्रोत सतत ,
   चिर- साश्वत  हैं ,  नयापन  है -


नैराश्य भी है तो आस भी है ,
   पीड़ा    है  , पश्चाताप  भी है ,
     इतिहास  के  पन्ने कहते हैं
       कांटे    हैं   तो   ताज   भी है -


टूटे   बहुत , पर   मिटे   नहीं ,
   अपनी संस्कृति   का दर्शन  है -


                                   उदय वीर सिंह
                                   05 -04 -2012 .





12 टिप्‍पणियां:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

नैराश्य भी है तो आस भी है ,
पीड़ा है , पश्चाताप है ,
इतिहास के पन्ने कहते हैं
कांटे हैं तो ताज भी है

क्या बात हे! वाह!!
इसे भी देखें-
‘घर का न घाट का’

expression ने कहा…

बेहद खूबसूरत............


नैराश्य भी है तो आस भी है ,
पीड़ा है , पश्चाताप है ,
इतिहास के पन्ने कहते हैं
कांटे हैं तो ताज भी है -
सादर.

dheerendra ने कहा…

अनुशीलन है,अध्यापन है,
संवेग कहीं बहरापन है,
जीवन के तथ्य तंतुओं का ,
बंधन है बिखरापन है

वाह!!!!!!बहुत सुंदर रचना,अच्छी प्रस्तुति,..

MY RECENT POST...फुहार....: दो क्षणिकाऐ,...

Anupama Tripathi ने कहा…

टूटे बहुत , पर मिटे नहीं ,
अपनी संस्कृति का दर्शन है -
सार्थक रचना ...
शुभकामनायें ..

रविकर फैजाबादी ने कहा…

बहुत सही |
आभार आपका ||

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हर प्रकार के रंगों से सजा जीवन

संध्या शर्मा ने कहा…

टूटे बहुत , पर मिटे नहीं , अपनी संस्कृति का दर्शन है -
सुन्दर सार्थक सोच... शुभकामनाएं

क्षितिजा .... ने कहा…

चक्षुहीन ,अंतस की ऑंखें ,
लिपीहीन वक्तव्यों में ,
ग्रंथों के विश्लेषण हैं ,
आवद्ध कहाँ कब शब्दों में-


विचलन है, स्पंदन है
अपकार , कहीं अराधन है-

क्या बात है ... !!

S.N SHUKLA ने कहा…

सुन्दर सृजन, बधाई.

कृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen" की नयी पोस्ट पर भी पधारें, आभारी होऊंगा.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुंदर ...यही जीवन है जहां आशा के साथ निराशा भी ही ...

सतीश सक्सेना ने कहा…

बहुत बढ़िया भाई जी ...
शुभकामनायें आपको !

डॉ. हरदीप कौर सन्धु ने कहा…

अपनी संस्कृति का दर्शन है -
बहुत सुंदर रचना !

ਬਹੁਤ ਹੀ ਵਧੀਆ ਲੱਗੀ ਇਹ ਖੁਲ੍ਹੀ ਕਵਿਤਾ
ਜਿੱਥੇ ਗੰਗਾ ਦੀ ਪਵਿਤਰ ਧਾਰਾ, ਫੁੱਲਾਂ ਵਾਲ਼ਾ ਵਿਹੜਾ ਹੈ।

ਬਹੁਤ ਵਧਾਈ !

ਹਰਦੀਪ