गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

शिनाख्त

देश का संबिधान एक है
किसी को घास की रोटी
किसी को मक्खन ब्रेड है
अभिशप्त बेचने को बिक जाए
जो कुछ भी रहा अवशेष है -
सोने की चिड़िया का आज
प्रदर्शित भग्नावशेष है -
सियासत अब पूजा नहीं
मसखरी हो गई है
कहीं भूख से मरते लोग कहीं
करोड़ों का कटता केक है -
झूठे आदर्श सत्य का सूर्यास्त 
जीवन पर लाशों का अभिषेक है 

उदय वीर सिंह 



उदय वीर सिंह

बुधवार, 30 दिसंबर 2015

घास की रोटी

बंद कर ली आँख जब , सूरज को डूबा कह दिया
मांगते हक जिंदगी का उनको अजूबा कह दिया -
तुमको जरूरत तख्त की तुमको जरूरत ताज की ,
दिल सिमट जाएगा ऐसे मजरे को सूबा कह दिया -
नफरत की आंधीयों को आवाज देने वाले मौन हैं
सरफरोश वतनपरस्ती को कैसे शिगूफ़ा कह दिया -
नसीब न रोटी घास की तन ईमान भी बिकने लगा
मुफ़लिसी लाचारगी से सियासतदान तौबा कर लिया

उदय वीर सिंह

शनिवार, 26 दिसंबर 2015

अमर वलिदानी बाबा जोरावर सिंह जी बाबा फतेह सिंह जी

अमर वलिदानी
बाबा जोरावर सिंह [28 Nov  1695 आंदपुर साहिब  -26 Dec 1705 सरहिंद ]
बाबा फतेह सिंह [ 22Dec 1699 आंदपुर साहिब - 26 Dec 1705 सरहिंद ]
 शहादत दिवस पर अश्रुपूरित नयनों से इन अद्द्भुत अकल्पनीय अमर वालिदानियों को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं ।
                "  हैरानगी है मौत को कि हमें मौत क्यों नहीं आती "
माँ का नाम -  गुरुमता सुंदरी जी 
पिता -            गुरु गोबिन्द सिंह 
नाम -           बाबा जोरावर सिंह  
जन्म स्थान - आनंदपुर साहिब  28 nov 1695
वलिदान दिवस - 26 Dec 1705  सरहिंद 
नाम     -      बाबा फतेह सिंह 
जन्म स्थान - आनंद पुर साहिब  22 Dec  1699
वालिदान दिवस - 26 Dec 1705  सरहिंद 
गुनाह - देशभक्ति , कौम का वफादार सिपाही होना,अपने संस्कारों पर अडिग रहना , इस्लाम स्वीकार नहीं        करना । मांता पिता के संस्कारों [सिक्खी] की अंतिम स्वांस तक रक्षा करना ।
सजा -  मौत जिंदा  दीवार में चुनवा कर  ।
संकल्प -धर्म की जीत
संदेश - वाहेगुरु जी दा खालसा वाहे गुरु जी दी फतेह
आदर्श - गुरु गोबिन्द सिंह जी
पहचान -पंच ककार
सूत्र वाक्य - देहि शिवा वर मोहे है शुभ कर्मन ते कबहुँ न डरो  ....
कर्म - ज़ोर जुल्म का विरोध
विश्व के सबसे कम उम्र के वलिदानी जिनका अदालत में मुकदमा चला ,जिसमें  अपनी वकालत वे स्वयं कर रहे थे । दादी माँ  [ गूजर कौर ] के  पावन सानिध्य में रह अपने संस्कारों दायित्वों और खाई कसमों  को सहर्ष जीवन देकर निभाया । जो नहीं मिलता कहीं और दुनियाँ के इतिहास में । जब गुरु परिवार खेरू खेरू हो गया , माँ से, पिता से ,घर से भाइयों से  आतातयियों के चौतरफा हमले के कारण पारिवारिक सदस्यों का बिछोड़ा हो गया । दो  बड़े भाई अजित सिंह ,जुझार सिंह चमकौर की जंग में शहीद हो गए । एक पिता शांत अविचलित हो धर्म की अग्नि कुंड में अपने लालों की आहुती दे रहा था । स्तब्ध थे दौर ,जुल्म  ही नहीं सितमगर भी ।
   मात्र छह साल और नौ साल से कम के इन अद्द्भुत अप्रतिम वलिदानियों की  पावन शहीदी स्थली पर गुरुद्वारा  फतेहगढ़ साहिब आज साक्ष्य स्वरूप हैं ।
       न झुका सके  जालिम औरंगजेब का फरमान, न ही सरहिंद का सूबेदार  नवाब वजीर खान की अदालत , न गद्दार गंगू पंडित की शिनाख्त ,न ही सुच्चा नन्द  की मौत की सिफारिस, न ही काजी का फतवा ,न ही सुख  एश्वर्य, जीवन का लोभ  ही ।
   गर्व है हम उनके वारिस हैं ।
     
उदय वीर सिंह



शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

देव दूत

गुलजार है ये धरती पैगंबरों की आमद से
मुख्तलिफ़ हैं जुबां लिबासो फिजा
पैगामे मोहब्बत एक है -
उदय वीर सिंह 
क्रिसमस की अनन्य बधाइयाँ, शुभकामनाएँ मित्रो ! मंगल प्रभात !
उदय वीर सिं

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

चिरैया पियासी है -

चिरैया पियासी है -
पानी बंदबोतल में, बंद दरवाजे हैं
आँखों में नीर ले चिरैया पियासी है -

पीर है पहाड़ जैसी ढलती न गलती है
नजरों के पिंजरे में कितनी उदासी है -

अम्मा के कान्हे लिपटी बापू के पाँव में
पुछती गुनाह क्यों बेटी मारी जाती है -

उड़ने को पंख दे दो खुला आसमान दो
तारों को तोड़ कैसे जमीं पे ले आती है -


उदय वीर सिंह

सोमवार, 21 दिसंबर 2015

उदय वीर सिंह

पूरी पृथ्वी नापी जा चुकी है कितनी किसकी है निर्धारित किया जा चुका है
काश उसके व उसके वासिन्दों का दर्द भी बाँट लेते ।
उदय वीर सिंह

रविवार, 20 दिसंबर 2015

तुम बदल न पाये खुद को 
औरों को बार बार कहते हो -
फूटी कौड़ी भी  न दे सके 
जरूरतमंदों को  जनाब 
बड़ी सिद्दत से जाँ निसार कहते हो -
बड़ी मुश्किल से निकाला सिर खिड़कियों से 
मजलूमों का लंबरदार कहते हो -
इश्कों हुश्न से भरा है पूरा पन्ना 
जिसे बेबसों का अखबार कहते हो -

उदय वीर सिंह
  

गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

शहादत दिवस 'गुरु तेगबहादुर सिंह जी ' .

महफूज है ये धरती शहादत की रौशनी से ....
नौवे पातशाह सिक्ख गुरु श्री तेगबहादुर सिंह जी महाराज जिन्हें जग ' हिन्द की चादर ' के नाम से पुकारता है ,उनके शहदी दिवस पर अश्रुपूरित नैनों से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हये अरदास [संकल्प ] करते हैं ,बाबे हर जन्म में तेरा प्यार, संस्कार, सदका मिले तेरी ' मीरी और पीरी ' पर खरा उतरें । जुल्म जबर का अंत मानवता की रक्षा हमारा लक्ष्य हो ... ।
आप जी दी शहीदी हमारी प्रेरणा ,संस्कार व गौरव का स्रोत है ...। आप जी का जीवन हिन्दुत्व की धर्म की रक्षा में सहर्ष अर्पित हो गया ,एक नया सूरज एक नया आसमान देकर । गर्व है हम आपके वारिस हैं ।
गुरु तेग बहादुर के चलत भयो जगत में शोक
हाय !हाय ! सब जग करे,जय,जय जय सुरलोक ॥
नौवे पातशाह ने फरमाया -
चिंता ताकी कीजिये जो अनहोनी होय .... ।
जो अपने आप में एक दर्शन समेटे है जो समीचीन ही नहीं सार्वकालिक है जरूरत है मीरी और पीरी के साथ आत्मसात करने की ।
दाते ! हम ऋणी हैं आप के .....
उदय वीर सिंह

मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

गर्दिशी कहिए ....

बिना बयां किए बयां हो जाए 
उसे गर्दिशी.... कहिए -
चढ़ कर सिर बोले जनाब 
उसे खुशी कहिए -
बिक जाए अनमोल भरे बाजार 
उसे बेबसी कहिए - 
लुटा दे जींद परवाने की तरह 
उसे ख़ुदकुशी कहिए -
किसी हुस्न  को इश्क का चिराग दे दे 
उसे आशिक़ी कहिए -
दिलों की रहबरी का खर्चा उठाए 
उसे मैकशी कहिए -

उदय वीर सिंह 

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

क्या लिखोगे सुखनवर ....

क्या लिखोगे सुखनवर पहले 
किसी सुख़न का अधिकार बन 
तमाशाई है ये दुनियाँ पहले 
किसी तमाशा का किरदार बन -
जिंदगी कोई जुमला नहीं है 
डूबती किश्ती का पतवार बन 
पीछे होती है जमात कलम आगे
काफिले का सरदार बन  -
पढ़ी जाती हैं खून से लिखी दासतां
खुद की कुर्बानी की तलवार बन -....

उदय वीर सिंह 

रविवार, 13 दिसंबर 2015

उन्माद में संवेदना मरी हुई सी लगती है ...

नीचे सुलगता हुआ ज्वालामुखी
ऊपर बर्फ जमी हुई सी लगती है -
कभी भी गिर जाएगा चमकता हुआ मकान
नींव की मिट्टी भुरभुरी हुई सी लगती है -
कितना अद्द्भुत गतिमान है ये  धरती
परंतु दबी हुई ठहरी हुई  सी लगती है-
विश्वास टूटा या स्वच्छंदता मुखर हुई
न्याय की कलम डरी हुई सी लगती है -
अंगुलियाँ काँपती या जोड़ती हैं अर्थ का गणित
उन्माद में संवेदना मरी हुई सी लगती है -
सच को सच कहने का संबल जिसे देना था
निष्प्राण निष्ठुर पर संगमरमरी सी लगती है-
किसी का क्या लुटा, इससे किसको है सरोकार
किसी के घर में ईद दिवाली सी लगती है -
ईमान के थैले से झाँकते शिगाफों का क्या
बीमार आँखों को धूप भी बदली  सी लगती है -

उदय वीर सिंह





शनिवार, 12 दिसंबर 2015

अनाथालय छोड़ आया है ....

न डरी कभी शैलाबो तूफान से ताउम्र
ये कैसा उसके जीवन में मोड़ आया है-
अपनी खुशी के लिए वो मन्नतें मांगे
बेटा मंदिर में नारियल फोड़ आया है -
बोझ बन गई है दर्दनाशिनी दर्द लेकर
जीवन की सांझ में रिश्ते तोड़ आया है -
खांसी जोड़ों के दर्द से नींद उचट जाती है
नामुराद रिश्तों का कैसा दौर आया है -
उसने सवाल भी न पूछा सूनी आँखों से
आज बेटा माँ को अनाथालय छोड़ आया है -

उदय वीर सिंह

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

प्रीत के पाँव में ...

प्रीत के पाँव में काँटों का सिलसिला न मिले
नेह के गाँव रहती है कभी फासला न मिले -


उदय वीर सिंह

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

इंसान कहाँ से लाओगे -

उज्र  है इतना  इंसानियत से तुम्हें 
फिर सुहेले इंसान कहाँ से लाओगे -
तेरे हाथों में सजी नंगी तलवारें हैं 
गुलिस्ते- गुलदान कहाँ से लाओगे -
फैलती रही यूं ही नफरत धरती पर 
हिन्दू -मुसलमान कहाँ से लाओगे  -
हथियारों की होड़ में खप रहे इस्पात 
खेती के लिए औज़ार कहा से लाओगे -
रख पट्टी आँख दुनियाँ देखने की कोशिश 
मित्र अँधेरों के सिवाऔर क्या पाओगे -

उदय वीर सिंह 



रविवार, 6 दिसंबर 2015

मलाल है जिंदगी से

 

 
क्यों    मिलता  है  ऐसा    हाल,
मलाल   है ,     जिंदगी       से -

क्या   पहनने  ओढ़ने  को  सिर्फ
दर्द  ही   हैं,  सवाल  है  जिंदगी से-

भूख ,   कचरों  में ढूंढ़  थक  गयी
मासूमियत  भी लाचार जिंदगी से -

कभी  दे  सको  तो इस्तहार देना
कितना  है इनको प्यार जिंदगी से -

धर्म, संसद, कानून का कितना रह
गया   है ,  सरोकार   जिंदगी   से  -

मिला किसी को नूर,दौलत माँ-बाप
किसका है इनको अब तक इंतजार ..... ?
है सवाल जिंदगी  से-...... |







बड़े भारी मन से .....

अनुत्तरित प्रश्नों का वो जवाब मांग लेती है
जब रूठती है तो अपना हिसाब मांग लेती है 
जब दामन दहकते अंगारों  से भर जाता है
बड़े भारी मन से कुदरत शैलाब मांग लेती है -
***
जब नदी की  सूरत एक नाली में सिमट रही
मजबूरन नदी अपना आकार मांग लेती है
भर जाता है शिगाफ़ों से बसुंधरा का आँचल
तंग हो बड़ी खामोशी से तेजाब मांग लेती है -

उदय वीर सिंह 


शनिवार, 5 दिसंबर 2015

हम भी तेरे साथ चलते

हम भी तेरे साथ चलते
रौशनी की ओर दोस्त !
काश मेरा भी सूरज
पूरब से उगता ........।
हमसाये साथ तो हैं
पर दिशायेँ विपरीत हैं
तेरे पास थैला है ,
मेरे पास भी है ,
तुमने किताबें सँजोई हैं
हमने कचरा
तुम भी जा रहे हो.... हम भी जा रहे हैं ...
अंतर सिर्फ इतना है
तुम स्कूल जा रहे हो
हम कचरे के ढेर
की ओर ...
तुम्हारे सामने खड़ा
ज्ञानार्जन का अवसर है
मेरे सामने जीविकोपार्जन की
मजबूरीयां हैं ....तेरा बचपन तेरे साथ है 
मेरा बचपन ख्वाब 
तेरे मेरे बीच सिर्फ 
इतनी ही दूरियाँ हैं .....

- उदय वीर सिंह

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

आईने बुरे लगते हैं ...

मत दिखाओं कि आईने बुरे लगते हैं
जिंदगी के सच मायिने बुरे लगते हैं-
तुम्हारी नजर में क्या है बता सकते हो
क्यों तुम्हें देख कर चेहरे डरे लगते हैं -
एतबार नहीं आता तेरे कसमो वादे पर 
सफगोई से परहेज फरेब बुरे लगते हैं -
नाइंसाफी की बुलंद करने वाले आवाज
शातिर को, हर फिक्रमंद बुरे लगते हैं -
जिंदगी की चहलकदमी थम ही जाती है
वक्त आता है रंगो लिबास बुरे लगते हैं -
उदय वीर सिंह

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

शनिवार, 28 नवंबर 2015

मुर्शद को कभी अपना

हर दर्द को आशिक़ी का दर्द न समझ
किसी की भूख के दर्द को अपना समझ -
फलसफा कोई भी हो अवाम के जानिब
इबादतखाने को अपना घर न समझ -
फलसफ़ों को ओढ़ कर तहजीब रहती है
मुर्शद को कभी अपना शागिर्द न समझ -
जख्म जो भरते नहीं वो खंजर के नहीं होते
गुलशन के गुलों को ही हमदर्द न समझ -
काया अनमोल है ये तुम्हारी समझ होगी
मातृभूमि की खाक को गर्द न समझ -
उदय वीर सिंह


शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

गुलाम बहुत हैं -

असहिष्णुता की बात पर परेशान बहुत हैं
खो गया इंसान कहीं अब भगवान बहुत हैं -
छीनी हंसी औरों की अब विलाप कर रहे
वे तोहमत लगा रहे जो बदनाम  बहुत हैं -
मुक्त नहीं हुए आजादी के बाद भी उदय
दरबारी मानसिकता के गुलाम बहुत हैं -
पीटने वालों छाती करा दो वापस ननकाना
साहिब हिन्दू सिक्खो के वहाँ मकान बहुत हैं
खड़ा करते हैं कटघरों में मुल्जिम की तरह
लगाते हैं इल्जाम जिनपर इल्जाम बहुत हैं -
बदलता नहीं साया रंग गिरगिट चाहे बदल ले
बदल लेने वाले पाला आज महान बहुत हैं
   

उदय वीर सिंह 

रविवार, 15 नवंबर 2015

खून खूनी जिंदगी ...

धर्म वालों मैं पुछना चाहता हूँ ---
***
किस धर्म का ये गीत है
खून खूनी जिंदगी -
किस पंथ की ये रीत है
कदमों के नीचे वंदगी -
करुणा दया के पाँव कटते
बेबस बनेगी जिंदगी -
किस धर्म की ये जीत है
रोएगी दर दर जिंदगी -
किस धर्म की ये प्रीत है 
लाशों पे जीती जिंदगी... -
किस धर्म की ये सीख है 
जीवन को जारे जिंदगी -

उदय वीर सिंह
     


सहिष्णुता/ असहिष्णुता ..





सहिष्णुता की बात पर परेशान बहुत हैं 
खो गया इंसान कहीं अब भगवान बहुत हैं -
छीनी हंसी औरों की अब विलाप कर रहे
वे तोहमत लगा रहे जो बदनाम बहुत हैं -
मुक्त नहीं हुए आजादी के बाद भी उदय 
दरबारी मानसिकता के गुलाम बहुत हैं - 
पीटने वालों छाती करा दो वापस ननकाना
साहिब हिन्दू सिक्खो के वहाँ मकान बहुत हैं -
खड़ा करते हैं कटघरों में मुल्जिम की तरह
लगाते हैं इल्जाम जिनपर इल्जाम बहुत हैं -
बदलता नहीं साया रंग गिरगिट चाहे बदल ले
बदल लेने वाले पाला आज महान बहुत हैं-

उदय वीर सिंह

शनिवार, 14 नवंबर 2015

नीर न जाने बहते क्यों .....

जब आँखों में नेह नहीं
नीर न जाने बहते क्यों ?

नेह नयन में आया जब
नीर न जाने बहते क्यों ?

सूनी आँखों के मरुधर...
प्रेम के बदल ढूंढ रहे
जलते पांव वेदन बढती है
नीर न जाने बहते क्यों ?

रूठा मीत परदेस बसा
न मना सके कर जोड़ उसे
ह्रदय मुकुर मन टूट गया
नीर न जाने बहते क्यों ?

उदय वीर सिंह

शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

किसी की वंदगी को देख


















 



है मौत की अमानत 
हँसती जिंदगी को देख -
ढूँढता है दूसरों में पहले
अपनी गंदगी को देख -
कुफ़्र की चिंता तुम्हें है
किसी की सादगी को देख -
तुम खड़े हो शमशीर लेकर
किसी की वंदगी को देख -


उदय वीर सिंह


गुरुवार, 22 अक्तूबर 2015

बुत की प्राण प्रतिष्ठा है ....

बुत की प्राण प्रतिष्ठा है
सड़कों पर जीवन रोता है -
अर्पित करते अर्थ द्रव्य
कहीं जीवन भूखा सोता है -
रोज बदलते परिधान स्वर्ण
कहीं जीवन नंगा होता है -
बहती धार पय घृत अमृत की
जीवन आँसू पीता है -
भाग्य जन्म का दोष समझ
जीवन अभिशापित जीता है -
पत्थर में जीवन की आशा
कहीं जीवन पत्थर होता है -


उदय वीर सिंह


बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

आरत मन होता है -

Udaya Veer Singh's photo.सोच अतीत का यश वैभव
आरत मन होता है -
परिदृश्य आज का देख
आहत मन होता है -
दुरभि संधियों का पढ़ प्रलेख 
विक्षत मन होता है -
काँटों के सिंचन से कितना
चिंतित मन होता है -
किसको गले लगाया सोच
विकृत मन होता है -
प्रज्वलित शिखा में भष्म शेष
घर किसका आँगन होता है -

उदय वीर सिंह

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

रेप दमन संहार भूल जा पगले .....

तब सूरज चमकेगा मेरा

जब डूबेगा तेरा -
जागेगा बल पौरुष मेरा
जब बंधित होगा तेरा -
मनोरथ पूरा होगा मेरा
जब टूटेगा तेरा -
तब फिर दाल गलेगी मेरी
जब घर जलेगा तेरा -
न्यारा महल सजेगा मेरा
डेरा जब उजड़ेगा तेरा -
जा मधुशाला बेसुध हो जा
वह भाग्य लिखेगा तेरा -
धर्म संप्रदाय का वैर सराहो
हथियार बिकेगा मेरा -
शांति रहेगी जब समाज मेँ
क्या वजूद रहेगा मेरा
रेप दमन संहार भूल जा पगले
यह काम सोचना मेरा -

उदय वीर सिंह .



सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

अपनी खबर को छोड़कर

उन्हें सबकी खबर है सिर्फ
अपनी खबर को छोड़कर
उनको मालूम है सबकी सिर्फ
अपनी उमर को छोड़कर -
कभी बता भी देते हैं उदय
आवाम की उमर को जोड़कर
उन्हे मालूम है लाश उनकी
कंधों पर उनके नहीं जाएगी
फातिहा पढ़ सकेगे सबकी
सिर्फ अपनी कब्र को छोड़कर -
उन्हें यकीन है नजरें देखती नहीं
सिर्फ उनकी नजर को छोड़कर -
नीचे धूपो गर्मी बेहिसाब होती है
सिर्फ उनके शजर को छोड़कर -

उदय वीर सिंह