शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

अभिव्यक्तियों के नाम पर-

गुलशन में कांटे उग रहे माली कही जा सो रहा 
सिरफिरे आजाद क्यों हैं अभिव्यक्तियों के नाम पर-
ये वतन तन्हा नहीं वतनपरस्ती नाल है
हम छोड़ दें ईमान कैसे अभिव्यक्तियों के नाम पर -
कौन है आजाद ,किसको आजादी नहीं
क्या देश को भी बाँट दे अभिव्यक्तियों के नाम पर-
मिली पनाह उनको भी जो दर- बदर भटकते रहे 
वो दे रहे हैं गलियाँ अभिव्यक्तियों के नाम पर -
ये वतन कभी लाचार था न आज भी लाचार है 
गद्दारी स्वीकार कैसे अभिव्यक्तियों के नाम पर -

उदय वीर सिंह 






1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (13-02-2016) को "माँ सरस्वती-नैसर्गिक शृंगार" (चर्चा अंक-2251) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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बसन्त पंञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'